ह्रदयनारायण दीक्षित / लखनऊ
जीवन की सांझ’ भी आती है। संध्या आती है प्रतिदिन। सभी प्राणी घर लौटते हैं। सूर्य अस्त होते हैं। इसी तरह ‘वृद्धावस्था’ जीवन की सांझ है। यह अचानक नहीं आती। धीरे-धीरे ‘जीवन-ऊर्जा’ घटती है। शरीर क्षीण होता है। मन और शरीर का संगीत टूटता है। मन कहता है-नाचें। गतिशील रहें। चरेवैति-चरेवैति। चलते रहें। ‘गति’ ऋषि-आह्वान है। मन करता है कि इसी के अनुसार चलते रहें, लेकिन शरीर शिथिल और लाचार होता है। तब झिलमिल तारों की आकाशगंगा के दर्शन ‘आनंद’ नहीं देते। नदियां प्रवाहमान हैं, गतिशील हैं। उनके ‘नाद’ आनंदित करते हैं। धीरे-धीरे नाद की ध्वनि मद्धिम होती है। श्रवण-शक्ति कम होती है। स्मृति भी क्षीण होती है, इसलिए सभी वृद्ध तरुणाई की स्मृतियों में रस लेते हैं। वर्तमान ‘भूत’ होता है प्रतिपल। ‘भूत-अनुभूत’ है सबके भीतर। जरामरण सारभूत हैं। यह जीवन का ध्रुव और अटल सत्य है। महाभारत के यक्षप्रश्न और युधिष्ठिर के उत्तर सामने हैं। ‘मृत्यु’ सत्य है, लेकिन लोग इस सत्य को स्वीकार नहीं करते। ‘वृद्ध’ होना भी जीवन का पीड़ादायी सत्य है। शरीर भी फल की तरह पकता है। पहले खट्टा होता है फल। फिर धीरे-धीरे रसवान होता है। मधुवान होता है। गंधवान होता है। ‘पक्षी’ फलवान-मधुवान वृक्षों पर गीत गाते हैं। पूरा पका फल एक दिन टहनी-डंठल से अलग हो जाता है। ऋग्वेद के ऋषि-कवि ने त्रयंबकदेव से स्तुति की है, ‘हम त्रयंबक रुद्र का ध्यान करते हैं। वे पोषणदाता हैं। वे पककर अलग हो जाने वाले ककड़ी-खीरा की तरह हमको मृत्युबंधन से अलग करें। मुक्त करें।’
वृद्धावस्था स्वाभाविक है लेकिन हिंदू-परंपरा के अनुसार ‘देवता’ वृद्ध नहीं होते। देवताओं पर समय का प्रभाव नहीं पड़ता। ऋग्वेद (६.२४.७) में कहते हैं, ‘संवत्सर ‘इंद्र’ को क्षीण नहीं कर सकते। मास भी इंद्र को क्षीण नहीं कर सकते और दिन भी।’ कालचक्र भी क्षीण-जीर्ण नहीं होता। यह अजर-अमर है।
