मुख्यपृष्ठसमाचारकहानी अनकही: खामोश होता बचपन

कहानी अनकही: खामोश होता बचपन

सना खान

आरव को बचपन में अपनी बनाई चीजें बहुत पसंद थीं। वो कभी कागज पर घर बनाता, कभी कहानियां लिखता, कभी आईने के सामने खड़े होकर अपने सपनों के बारे में खुद से बातें करता। उसकी आंखों में एक अलग दुनिया थी। लेकिन घर में उसकी दुनिया से ज्यादा दूसरों के बच्चों की बातें होती थीं। ‘देखो वो कितना होशियार है’ ‘उसके जैसे अंक लाओ’ ‘तुम हमेशा पीछे क्यों रह जाते हो?’ शुरुआत में आरव सिर्फ चुप हो जाता था। फिर उसने अपनी कॉपी छुपानी शुरू कर दी। अपनी बातें बताना कम कर दिया और धीरे-धीरे खुद पर भरोसा करना छोड़ दिया। अब अगर वो कुछ अच्छा भी करता तो सबसे पहले उसे यही डर लगता कि कहीं वो किसी से कम न पड़ जाए। कुछ बच्चे तारीफ मिलने के बाद भी खुश नहीं हो पाते, क्योंकि उनके अंदर हमेशा तुलना की आवाज चलती रहती है। आरव अब हर छोटी बात पर खुद को दोष देने लगा था। अगर कोई नाराज हो जाए तो उसे लगता कि गलती उसी की होगी। अगर कोई उससे बेहतर कर जाए तो वो पूरी रात अपने अंदर कमियां ढूंढता रहता।
धीरे-धीरे उसने अपनी पसंद बदल दी,
अपने सपने बदल दिए, यहां तक कि अपने होने का तरीका भी बदल दिया। सिर्फ इसलिए ताकि लोग उसे स्वीकार कर लें। एक दिन उसने अपनी पुरानी ड्रॉइंग कॉपी खोली। उसमें एक छोटा-सा घर बना था, पास में पेड़ थे और नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था ‘मैं बड़ा होकर खुश रहना चाहता हूं’ आरव बहुत देर तक उस लाइन को देखता रहा, क्योंकि उसे एहसास हुआ कि बड़े होते-होते वो सफल बनने की कोशिश में इतना खो गया कि खुश रहना ही भूल गया।
कुछ बच्चे बचपन में हारते नहीं हैं, वो धीरे-धीरे खुद को खो देते हैं। सबसे दर्दनाक बात यह है कि कई बार उन्हें तोड़ने वाले लोग यही सोचते रहते हैं कि वो उन्हें ‘बेहतर’ बना रहे हैं।

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