विमल मिश्र / मुंबई
चढ़ती त्योरियां, कसती मुठ्ठियां और चढ़ता पारा – मुंबई के सीएसएमटी, चर्चगेट, दादर, घाटकोपर, बोरिवली और भाईंदर स्टेशनों पर लोकल ट्रेनों की पीक आवर की भीड़ का जो लोग हिस्सा बने हैं, टोक्यो मेट्रो स्टेशन पर आकर उनके अचरज का ठिकाना नहीं रहेगा। मुंबई की ही तरह हर ओर से उमड़ते मुसाफिरों के रेले, पर रेलवे की उद्घोषणाओं और ट्रेन की आवाज को छोड़कर कोई कोलाहल नहीं। शांति से कान में ईयर बड खोंसे एयर कंडीशंड कोच में मनपसंद कार्यक्रम सुनिए या झपकी लीजिए। बैठने की सीट मिले, न मिले, इतना पक्का है उतरते – चढ़ते वक्त आपकी कमीज की क्रीज पर सिलवट नजर नहीं आएगी। ८०-१०० किलोमीटर औसत गति से दौड़ती ट्रेन वसई – विरार, कर्जत – कसारा, पनवेल या इनसे भी ज्यादा रास्ता तय करे और इसका आपको पता चले, तब तक आपका मुकाम आ गया होगा।
टोक्यो एयरपोर्ट के मेट्रो स्टेशन से जब होटल के लिए चला तो एहतियातन मोबाइल साइलेंट पर ही था। टोक्यो यूनिवर्सिटी के मित्र प्रोफेसर का कॉल आने पर जैसे ही कानों पर लगाया, बगल में बैठे भानजे ने इशारे से रोका। हमें मैसेज पर बातें करनी पड़ी। खचाखच भरे कोच में एकदम सन्नाटा। साइलेंट मोड ऑन करके लोग मोबाइलों में मगन। वजह? ट्रेनों और बसों में बातें करना – जो हमारे देश में रिवाज है- जापान में वर्जना है। ऊंचा बोलना, बगैर ईयर फोन के कुछ देखना – सुनना या फोन पर बातें करना अशिष्ट व्यवहार माना जाता है। हर सीट पर लिखा भी है कि अपने फोन साइलेंट मोड पर रखें। थकावट से आंखें झंपी जा रही हैं, तभी बगल का युवक ऊंघते हुए मेरे कंधों पर झुककर हमारी लोकल की याद दिला जाता है। जापान में इसे ‘इनेमुरी’ कहते हैं, यानी कि सरेआम सोना। लोग बैठे-बैठे सो जाते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कोई भी उपर रखा उनका सामान नहीं चुराएगा और स्टॉप पर उन्हें जगाने के लिए भी कोई -न- कोई होगा। शिंजुकू की धुन अलग, शिबुया की अलग – टोक्यो के हर स्टेशन की अलग – अलग ट्यून होती है, जिसे सुनकर ही समझ जाते हैं कि कौन सा स्टेशन आने वाला है। कुछ स्टेशनों पर हमने एनिमे या वहां के प्रसिद्ध गाने की ट्यून भी बजते सुनी।
मुंबई की लोकल ट्रेनों का पहला मुकाबला टोक्यो की लोकल ट्रेन (मेट्रो) से क्यों होता है और दोनों में फर्क क्या है, इसका अंदाजा पहले दिन ही हो गया, जब मैने अदल -बदलकर अलग – अलग लाइनों पर आठ घंटे में सात मेट्रो यात्राएं कीं, इनमें भी दो बगैर किसी संगी के। चढ़ना है तो बाईं ओर और उतरना है तो दाईं तरफ- सीढ़ी, एस्केलेटर या लिफ्ट में चढ़ने से लेकर डिब्बे में चढ़ने-उतरने और फिर बाहर आने तक कतार में रहना जापान में नियम है। किसी के साथ सफर कर रहे हों तो आगे-पीछे खड़े हों न कि अगल-बगल। लिफ्ट में वरिष्ठ नागरिक, विकलांग और सामान लेकर चल रहे यात्रियों को पहले जाने देना है। आखिर में उतरने वाले हों तो बाकी मुसाफिरों तक बटन दबाकर लिफ्ट रोके रखना आपका ही काम है। मेट्रो परिसर में धूम्रपान, थूकना, खाना और पीना बिलकुल मना है। डस्टबिन तो कहीं मिलेगी ही नहीं, इसलिए अपना कचरा साथ ही रखिए। बारिश के दिनों में छाते के लिए प्लास्टिक कवर साथ लेकर चलिए, वरना स्टेशनों पर उठा लीजिए, मुफ्त में मिलते हैं। बस में कंडक्टर नहीं दिखे? कोई बात नहीं। चढ़ते समय ड्रॉइवर के पास लगे पैनल पर स्मार्ट कार्ड वेव कीजिए, किराया आप से आप कट जाएगा। गंतव्य आने वाला है, सीट के पास लगा ‘स्टॉप’ बटन दबाइए और उतर जाइए। इमरजेंसी है तो चालक से सीधे इंटरकॉम पर बात कर लीजिए। जापान के चिबा शहर में दुनिया की सबसे लंबी मोनो रेल भी चलती है – पटरियों के ऊपर नहीं, नीचे लटककर। हयाबुसा ट्रेन तो सीकन टनल से लगभग २३ किलोमीटर का सफर समुद्र तल से २४०-२५० मीटर नीचे पूरी तरह पानी के नीचे ही तय करती है।
जैसे – जैसे ज्ञान बढ़ता गया, टोक्यो की इस ‘लोकल’ ट्रेन से यात्रा का मजा आता गया। जापानी नामों को याद रखने में दिक्कत हुई तो हमने स्टेशनों को नाम नहीं, उनके नंबरों से याद रखा। एक बार किसी दूसरी लाइन में कोई खराबी आ गई तो हमारी मेट्रो के यात्रियों को एल.सी.डी. स्क्रीन के माध्यम से सूचित कर दिया गया, ताकि वे अपनी आगे की यात्रा प्लान कर सकें। भीड़ होने पर या यात्रियों को कोई सूचना तुरंत देने की हालत में हमने एक पैडेस्टल पर प्लेटफॉर्म सुपरवाइजर को अपने कॉर्डलेस माइक से उद्घोषणा करते भी देखा।
टोक्यो – जहां से रोजाना ४००० से ज्यादा ट्रेनें आती और जाती हैं – शिबुया और शिंजुकू के साथ जापान के व्यस्ततम स्टेशनों में से है। इसके भीतर एक होटल भी है। जापान के दो पूर्व प्रधानमंत्रियों की हत्या टोक्यो स्टेशन पर हो चुकी है। ताकाशी हारा, जिनकी हत्या १९२१ में साउथ गेट के पास की गई थी और दूसरे ओसाची, जिनकी हत्या का प्रयास यहां १९३० में किया गया था। हमने स्टेशन पर उनकी याद में स्मृति पटल भी देखा।
देर होने पर विलंब प्रमाण पत्र
जापान में ट्रेनों की समय की पाबंदी किंवदंती है। यहां मेट्रो ट्रेनें मिनट नहीं, सेकंड के हिसाब से चलती हैं। अगर काेई ट्रेन २०-३० सेकंड भी लेट हो जाए तो रेलवे आधिकारिक वेबसाइट पर सार्वजनिक माफीनामा जारी करती है। यदि इस देरी के कारण ऑफिस या स्कूल छूटता है तो स्टेशन मास्टर यात्रियों को विलंब प्रमाण पत्र देते हैं, ताकि वे नौकरी या स्कूल में हाजिरी से छूट पा सकें। सुरक्षा और आत्महत्या की घटनाओं को रोकने के लिए प्लेटफॉर्मो पर आधी लंबाई स्क्रीन डोर भारत की मेट्रो में भी कहीं – कहीं हैं, पर टोक्यो में उनके छोर पर नीली एलईडी लाइट्स लगाई गई हैं, क्योंकि माना जाता है कि नीला रंग इंसानी दिमाग को शांत और गुस्से या तनाव को कम करता है।
इस छोटे से बदलाव ने मेट्रो स्टेशनों पर कूदने की घटनाओं में भारी कमी ला दी है। हमने यहां के मेट्रो ड्राइवर और स्टेशन स्टाफ को काम के दौरान चिल्लाने के साथ लगातार हवा में अपनी उंगलियों से अलग-अलग दिशाओं में इशारा (शिकी कांको) करते भी देखा। यह जापानी तकनीक है, जिससे गति, सिग्नल और ट्रैक की स्थिति को उंगली से दिखाकर और बोलकर सत्यापित किया जाता है। इससे मानवीय गलतियों की आशंका ८५ फीसदी तक कम हो जाती है।
दिव्यांगों का विशेष ध्यान
हमारी एक यात्रा में व्हीलचेयर वाली एक यात्री भी थी। हमने देखा, व्हीलचेयर लॉक करने के लिए नियत विशेष खाली जगह पर उसे सवार कराने के लिए स्टेशन स्टाफ प्लेटफॉर्म पर फोल्डेबल रैंप लेकर आया। इसीके साथ उतरने वाले स्टेशन पर भी इस दिव्यांग यात्री की इत्तिला हो चुकी थी, जहां दूसरा स्टाफ सुरक्षित उतारने के लिए रैंप के साथ उसका इंतजार कर रहा था। सुविधाओं के लिहाज से दिव्यांगों के लिए ऐसी मैत्रीपूर्ण जगह आपको विश्व में दूसरी नहीं मिलेगी। मेट्रो और बुलेट ट्रेन स्टेशनों के गेट्स पूर्णत: स्वचालित हैं और दिव्यांगजनों और दृष्टिबाधित यात्रियों के लिए साइड से निकलने की व्यवस्था है। स्टेशनों पर न सिर्फ उनके वास्ते व्हीलचेयर के अनुकूल बड़ी लिफ्ट लगी होती हैं, बल्कि प्रत्येक ट्रेन कोच में उनके, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं के लिए आरक्षित ‘सिल्वर सीट्स’ भी हैं – अतिरिक्त चौड़े और सुलभ बहुउद्देशीय शौचालय के साथ, जिनमें रेलिंग, आपातकालीन बटन और ऑस्टोमेट बैग साफ करने के लिए सिंक जैसी आधुनिक सुविधाएं होती हैं। दृष्टिबाधित लोगों के लिए हमने ट्रेन और बस स्टेशनों ही नहीं, गलियों और सड़कों तक पर टैक्टाइल पेविंग ब्लॉक्स (पीले रंग की उभरी हुई लाइनें) लगे देखे, जो उन्हें रास्ता दिखाने में मदद करते हैं। भीड़भाड़ के समय महिलाओं की सुरक्षा के लिए हमारी लोकल की ही तरह मेट्रो में अलग डिब्बे होते हैं, जिनकी पहचान प्लेटफार्म पर गुलाबी रंग के चिह्नों से की जा सकती है। (जारी)
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर
संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)
