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साहित्य शलाका:नई शिक्षा नीति और हिंदी साहित्य… भारतीयता, रोजगार और सांस्कृतिक चेतना का नया विमर्श

प्रो. दयानंद तिवारी

आज का समय तीव्र परिवर्तन का समय है। विज्ञान, तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सोशल मीडिया और वैश्वीकरण ने मानव जीवन की दिशा और दृष्टि दोनों बदल दी हैं। शिक्षा का स्वरूप भी अब केवल ज्ञानार्जन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह रोजगार, व्यक्तित्व निर्माण, कौशल विकास और सामाजिक चेतना का माध्यम बन चुका है। ऐसे समय में भारत की ‘नई शिक्षा नीति २०२०’ केवल एक शैक्षणिक दस्तावेज नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति और भाषाई स्वाभिमान के पुनर्जागरण का घोषणापत्र प्रतीत होती है। विशेष रूप से हिंदी साहित्य के संदर्भ में यह नीति नई संभावनाओं, नए विमर्शों और नए दायित्वों को जन्म देती है।
लंबे समय तक हिंदी साहित्य को केवल कविता, कहानी, उपन्यास और आलोचना तक सीमित करके देखा गया। विश्वविद्यालयों में साहित्य अध्ययन का उद्देश्य प्राय: परीक्षा और डिग्री प्राप्ति तक सीमित रह गया। परिणामस्वरूप विद्यार्थियों के मन में यह धारणा बनने लगी कि हिंदी साहित्य जीवन और रोजगार दोनों की दृष्टि से सीमित संभावनाओं वाला विषय है। नई शिक्षा नीति ने इस भ्रम को तोड़ने का प्रयास किया है। इस नीति में मातृभाषा, भारतीय भाषाओं और भारतीय ज्ञान परंपरा को जिस प्रकार महत्व दिया गया है, वह हिंदी साहित्य के लिए एक नए युग का संकेत है।
नई शिक्षा नीति स्पष्ट रूप से कहती है कि प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा अथवा स्थानीय भाषा में दी जानी चाहिए। यह केवल भाषाई आग्रह नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक सत्य भी है कि बालक अपनी मातृभाषा में अधिक सहजता और गहराई से सीखता है। हिंदी केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, लोकजीवन, संवेदना और सामाजिक चेतना की वाहक भाषा है। जब शिक्षा अपनी भाषा में होगी, तब ज्ञान केवल मस्तिष्क तक ही नहीं बल्कि हृदय तक पहुंचेगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हिंदी साहित्य को केवल अतीत की स्मृतियों में वैâद न रखा जाए, बल्कि उसे वर्तमान और भविष्य से जोड़ा जाए। विश्वविद्यालयों में हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रमों को रोजगारपरक और जीवनोपयोगी बनाने की आवश्यकता है।
नई शिक्षा नीति का बहुविषयक दृष्टिकोण इस दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण है। अब हिंदी साहित्य का विद्यार्थी केवल अध्यापक बनने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वह मीडिया, पत्रकारिता, फिल्म लेखन, डिजिटल कंटेंट, विज्ञापन, अनुवाद, वेब पत्रकारिता, रेडियो, पॉडकास्ट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे आधुनिक क्षेत्रों में भी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा सकेगा।
डिजिटल युग में हिंदी की संभावनाएं अत्यंत व्यापक हुई हैं। आज सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, यूट्यूब, ब्लॉगिंग और ध्ऊऊ माध्यमों पर हिंदी सामग्री की मांग तेजी से बढ़ रही है। बड़ी-बड़ी तकनीकी कंपनियां भारतीय भाषाओं के लिए कंटेंट तैयार कर रही हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में भी हिंदी भाषा विशेषज्ञों और साहित्यकारों की आवश्यकता बढ़ रही है। यह समय हिंदी साहित्य को केवल भावनात्मक विषय न मानकर ‘ज्ञान और रोजगार’ दोनों का माध्यम बनाने का है।
नई शिक्षा नीति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष भारतीय ज्ञान परंपरा का पुनर्स्थापन भी है। भारतीय शिक्षा की आत्मा सदैव मूल्यपरक रही है। हमारे वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, गीता, कबीर, तुलसी, सूर और प्रेमचंद केवल साहित्य एवं साहित्यकार नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टा रहे हैं। हिंदी साहित्य में भारतीय जीवन मूल्यों, लोकमंगल, सह-अस्तित्व, प्रकृति प्रेम, नैतिकता और राष्ट्रचेतना की समृद्ध परंपरा रही है। नई शिक्षा नीति इस परंपरा को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने का प्रयास करती है।
आज का युवा तकनीकी रूप से सक्षम तो है, परंतु मानसिक तनाव, सांस्कृतिक विघटन और नैतिक भ्रम से भी जूझ रहा है। प्रतिस्पर्धा और उपभोक्तावाद ने उसे भीतर से अकेला बना दिया है। ऐसे समय में साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मनुष्य को संवेदनशील बनाने वाली शक्ति है। कबीर का विवेक, तुलसी का लोकमंगल, प्रेमचंद की सामाजिक दृष्टि और निराला का स्वाभिमान आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने अपने समय में थे। साहित्य मनुष्य को केवल पढ़ा-लिखा नहीं बनाता, बल्कि उसे मनुष्य बनाता है।
हालांकि, नई शिक्षा नीति के सामने अनेक चुनौतियां भी हैं। उच्च शिक्षा में हिंदी माध्यम की पर्याप्त व्यवस्था अभी भी नहीं है। तकनीकी और वैज्ञानिक विषयों की गुणवत्तापूर्ण हिंदी पुस्तकों का अभाव है। अंग्रेजी के प्रति आकर्षण और मानसिक दासता भी हिंदी के मार्ग में बाधा बनती है। यदि वास्तव में भारतीय भाषाओं को सशक्त बनाना है, तो विश्वविद्यालयों में हिंदी व अन्य भाषाओं में उच्चस्तरीय सामग्री, डिजिटल संसाधन और शोध संस्कृति को विकसित करना होगा।
साथ ही साहित्यकारों और शिक्षकों की भी बड़ी जिम्मेदारी है। उन्हें विद्यार्थियों को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रखकर जीवन, समाज और राष्ट्र से जोड़ना होगा। साहित्य को पुस्तकालयों की धूल से निकालकर समाज की चेतना से जोड़ना होगा। आज आवश्यकता ऐसे सााfहत्य की है जो युवा पीढ़ी को दिशाहीनता से निकालकर राष्ट्रनिर्माण, सांस्कृतिक चेतना और मानवीय मूल्यों की ओर अग्रसित और प्रेरित करे।
नई शिक्षा नीति वास्तव में भारतीय आत्मा की पुनर्प्रतिष्ठा का प्रयास है। यह नीति केवल शिक्षित भारत नहीं, बल्कि संस्कारित और आत्मनिर्भर भारत का स्वप्न प्रस्तुत करती है। हिंदी साहित्य इस परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम बन सकता है, क्योंकि भाषा ही संस्कृति की वाहक होती है और साहित्य उस संस्कृति का जीवंत स्वर।
अंतत: कहा जा सकता है कि यदि शिक्षा रोजगार के साथ संस्कार भी दे, यदि साहित्य परीक्षा के साथ जीवन-दृष्टि भी दे और यदि भाषा केवल संप्रेषण नहीं, बल्कि आत्मगौरव का आधार बने, तो नई शिक्षा नीति भारत को ज्ञान, संस्कृति और मानवीय मूल्यों की विश्वशक्ति बनाने में निश्चित रूप से सफल होगी।
कहा गया है, ‘भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं, राष्ट्र की आत्मा का स्वर होती है।’ स्पष्ट है कि जिस शिक्षा में संस्कृति नहीं, वह केवल सूचना है और जिस साहित्य में समाज नहीं, वह केवल शब्द है।
अत: ‘नई शिक्षा नीति का लक्ष्य केवल डिग्री नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कार और आत्मनिर्भरता है।’

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