सना खान
हर बच्चा किताबों में अच्छा हो ये जरूरी नहीं। लेकिन हर बच्चा अंदर से कुछ महसूस करता है ये जरूरी है।
कुछ बच्चे बहुत बोलते हैं क्योंकि वो अपनापन चाहते हैं। और कुछ बच्चे बिल्कुल चुप हो जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी बात कोई समझेगा ही नहीं। हम बच्चों को स्कूल भेजते हैं, अच्छे अंकों की उम्मीद करते हैं, उन्हें अनुशासन सिखाते हैं, लेकिन अक्सर उनकी खामोशी पढ़ना भूल जाते हैं। जब कोई बच्चा अचानक गुस्सा करने लगे, अकेला रहने लगे या छोटी-छोटी बातों पर रोने लगे तो हर बार उसे ‘जिद’ मत समझिए कभी-कभी वो अंदर की उलझन होती है।
बच्चों को सिर्फ आदेश नहीं चाहिए उन्हें अपनापन चाहिए। उन्हें कोई ऐसा चाहिए जो उनकी बात बीच में रोके बिना सुने जो हर गलती पर डांटे नहीं बल्कि ये पूछे – ‘तुम ठीक हो?’ क्योंकि बचपन में मिला व्यवहार पूरी जिंदगी की मानसिक स्थिति बना देता है। हर बार तुलना करना हर बार किसी और जैसा बनने का दबाव देना धीरे-धीरे बच्चों को खुद से दूर कर देता है। कुछ बच्चे डर की वजह से चुप रहते हैं और कुछ सिर्फ इसलिए समय से पहले समझदार बन जाते हैं क्योंकि उन्हें बहुत जल्दी समझौता करना पड़ता है। बच्चों को सिर्फ मजबूत बनाना जरूरी नहीं उन्हें मन से सुरक्षित महसूस करवाना भी जरूरी है। क्योंकि बच्चे शब्द शायद भूल जाएं लेकिन वो ये कभी नहीं भूलते कि उन्हें कैसा महसूस करवाया गया था।
(अगर बचपन में उनकी मानसिक स्थिति को नजरअंदाज किया जाए तो वही दर्द, बड़े होकर बेचैनी, असुरक्षा और खामोशी बन जाता है। इसलिए बच्चों को सिर्फ सफल बनाना जरूरी नहीं, उन्हें भावनात्मक रूप से मजबूत और स्वस्थ बनाना भी उतना ही जरूरी है।)
