– सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल की दमदार दलील
– चुनाव आयोग के पैâसले को अदालत में घेरा
सामना संवाददाता / मुंबई
असली शिवसेना ठाकरे की ही है। ‘शिवसेना’ पार्टी का नाम भी ठाकरे का ही है। ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न शिंदे गुट को नहीं दिया जा सकता। अदालत को यह घोषित करना चाहिए। शिंदे गुट ने ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न का अनधिकृत इस्तेमाल किया है। इस तरह की गैरकानूनी कार्रवाई करने वाले शिंदे गुट का इस नाम और चिह्न पर कोई अधिकार नहीं है। वास्तविक अधिकार हमारी मूल शिवसेना का है। इसलिए ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न हमें दिया जाए, अन्यथा इसे प्रâीज कर दिया जाए, ऐसी जोरदार दलील वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कल सर्वोच्च न्यायालय में दी। शिवसेना पक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे की ओर से मजबूती से पक्ष रखते हुए सिब्बल ने विधानसभा अध्यक्ष और चुनाव आयोग के फैसलों को गलत बताते हुए उन पर सवाल उठाए।
राज्यपाल से मिलने भर से शिंदे ‘पार्टी’ नहीं बन सकते
शिंदे गुट के विधायकों द्वारा विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर के पक्ष में मतदान करना दल-बदल का स्पष्ट उदाहरण है। सिब्बल ने कहा कि एकनाथ शिंदे का राज्यपाल से मिलना उन्हें राजनीतिक दल नहीं बना देता। शिवसेना उद्धव ठाकरे की ही पार्टी है। शिवसेना शिंदे की हो ही नहीं सकती।
निकाले गए शिंदे को पार्टी का नेता कैसे माना गया?
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कल सर्वोच्च न्यायालय में कहा कि एकनाथ शिंदे के गद्दारी करने के बाद उद्धव ठाकरे ने पक्षप्रमुख के तौर पर शिंदे को गुटनेता के पद से बर्खास्त कर दिया था। उनकी जगह अजय चौधरी को नियुक्त किया गया था। उस पत्र पर उद्धव ठाकरे के हस्ताक्षर थे। फिर विधानसभा अध्यक्ष और चुनाव आयोग ने शिंदे को पार्टी का नेता वैâसे माना? शिंदे गुट के व्हिप को किस आधार पर वैध ठहराया गया?
सिब्बल ने भारी दावा किया कि गैरकानूनी गतिविधियों को वर्षों तक जारी रहने देना और बाद में उन्हें वैधता देने की मांग करना सरकारी जमीन पर किए गए अनधिकृत निर्माण जैसा है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष शिवसेना मामले की अंतिम सुनवाई चल रही है। बुधवार को सुनवाई के सातवें दिन सिब्बल ने शिवसेना की ओर से जोरदार दलीलें रखीं। सुनवाई की शुरुआत में ही उन्होंने दसवीं अनुसूची के ‘फॉर्म बी’ और ‘स्पष्टीकरण बी’ पेश करते हुए शिंदे गुट की रणनीति को अदालत के सामने रखा। उन्होंने कहा कि शिंदे गुट के विधायकों ने विधानसभा पहुंचने के लिए जिस पार्टी नेतृत्व का सहारा लिया, बाद में उसी नेतृत्व को चुनौती दी। सिब्बल ने सवाल उठाया कि कोई भी व्यक्ति अचानक खड़ा होकर यह कैसे कह सकता है कि वह आपको नेता नहीं मानता और उसका अपना ‘व्हिप’ होगा? दसवीं अनुसूची में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। दल-बदल को शुरुआत में ही रोकना दसवीं अनुसूची का मुख्य उद्देश्य है। यदि दल-बदल की अनुमति दी गई तो यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ेगी।
इसी संदर्भ में सिब्बल ने ‘किहोतो’ मामले के दो अनुच्छेद पढ़कर सुनाए। उन्होंने कहा कि दल-बदल एक पाप है। कर्नाटक मामले का फैसला भी यही कहता है। इसलिए १९ जुलाई के बाद शिंदे गुट को मिले समर्थन पर विचार करना दल-बदल को बढ़ावा देने जैसा होगा।
नार्वेकर का फैसला संविधान पीठ के निर्णय के पूरी तरह विरुद्ध
सिब्बल ने सवाल किया कि विधानसभा अध्यक्ष संविधान पीठ के फैसले के खिलाफ कैसे जा सकते हैं? विधायकों के दल का प्रस्ताव राज्यपाल के पास कैसे भेजा जा सकता है? इसी वजह से राज्यपाल ने बहुमत परीक्षण का आदेश दिया था, जिसे ‘सुभाष देसाई’ मामले में गलत ठहराया गया। इसी को आधार बनाते हुए सिब्बल ने सर्वोच्च न्यायालय में दृढ़ता से कहा कि विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर का पैâसला संविधान पीठ के निर्णय के पूरी तरह विपरीत है।
-शिंदे गुट को आज ही अयोग्य
-घोषित कर सकते हैं?-न्यायालय का सवाल
गद्दार विधायकों की अयोग्यता को लेकर वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने दलीलें पेश कीं। कामत ने कहा कि यदि गद्दार विधायकों की अयोग्यता के मामले में न्यायालय हमारे पक्ष में पैâसला देता है, तो विधायकों की अयोग्यता पूर्व प्रभाव से लागू होगी। इस पर न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। न्यायालय ने सवाल किया कि क्या हम शिंदे गुट के विधायकों को आज ही अयोग्य घोषित कर सकते हैं? क्या विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका को स्वीकार करते हुए उन्हें अयोग्य ठहराया जा सकता है? न्यायमूर्ति बागची ने यह भी कहा कि यदि विधानसभा अध्यक्ष का दृष्टिकोण कानून के खिलाफ है, तो उसे रद्द करने में हमें कोई संदेह नहीं है।
शिवसेना की दलीलों के प्रमुख मुद्दे
शिंदे गुट के विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष २०१८ का पार्टी विधान पेश किया था। बाद में उन्होंने हलफनामा दाखिल कर इसे वकीलों की गलती बताया। सवाल है कि क्या ३९ वकीलों से एक ही गलती हुई या फिर यह कोई साजिश थी?
शिंदे गुट के विधायक पहले सूरत और फिर गुवाहाटी गए। ३० तारीख को उन्होंने भाजपा के साथ हाथ मिलाकर सरकार बना ली। उनका कृत्य बहुत कुछ स्पष्ट कर देता है। इसके लिए अलग से किसी अन्य सबूत की आवश्यकता ही नहीं है।
विधानसभा अध्यक्ष एक न्यायाधिकरण हैं। यदि उन्होंने गद्दार विधायकों की अयोग्यता के मामले में गलत तरीके से फैसला किया है, तो न्यायालय ‘न्यायिक पुनरावलोकन’ के माध्यम से विधानसभा अध्यक्ष के पैâसले को बदल सकता है।
न्यायालय केवल विधानसभा अध्यक्ष के आदेश को गैरकानूनी घोषित कर दे, तब भी उसका सीधा और निर्णायक प्रभाव पार्टी के चुनाव चिह्न के विवाद पर पड़ेगा।
पार्टी नेतृत्व की संरचना में बहुमत उद्धव ठाकरे के पास ही था। इसके बावजूद मूल शिवसेना की इच्छा के विरुद्ध एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बने, यह सभी जानते हैं। इसके लिए किसी अतिरिक्त सबूत की आवश्यकता नहीं है।
क्या पार्टी की संरचना बदले बिना कोई व्यक्ति राजनीतिक निर्णय ले सकता है? राजनीतिक आचरण का सीधा संबंध राजनीतिक दल से होता है।
