मुख्यपृष्ठस्तंभकोर्ट-रूम :  विवाह, धोखा और संबंधों से जुड़े अपराध

कोर्ट-रूम :  विवाह, धोखा और संबंधों से जुड़े अपराध

-धारा ६७, ६८ और ६९

एड. कनई बिस्वास

भाग:२३

विवाह और व्यक्तिगत संबंध विश्वास, सहमति और ईमानदारी पर आधारित होते हैं। यदि कोई व्यक्ति धोखे, झूठे वादे या गलत पहचान का इस्तेमाल करके संबंध बनाता है या विवाह से जुड़े अधिकारों का दुरुपयोग करता है, तो यह गंभीर अपराध बन सकता है। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), २०२३ की धारा ६७, ६८ और ६९ ऐसे ही अपराधों को स्पष्ट करती हैं।
केस स्टडी – १: ‘पहले से विवाह होने के बावजूद दूसरा विवाह’ (धारा ६७)
एक व्यक्ति ने अपनी पहली पत्नी के जीवित रहते हुए दूसरी महिला से विवाह कर लिया और अपने पहले विवाह की जानकारी छिपा ली।
अदालत क्या देखेगी?
क्या पहला विवाह कानूनी रूप से वैध था?
क्या आरोपी ने दूसरी शादी करते समय सच्चाई छिपाई?
क्या दूसरी महिला को धोखे में रखा गया?
फैसला – यह विवाह से जुड़े धोखे का मामला है। समझें: धारा ६७ के तहत पहले विवाह के रहते दूसरा विवाह करना और तथ्य छिपाना अपराध माना जा सकता है।
केस स्टडी – २: ‘झूठी पहचान से विवाह’ (धारा ६८)
एक व्यक्ति ने अपनी पहचान और आर्थिक स्थिति के बारे में झूठ बोलकर महिला से विवाह कर लिया।
अदालत क्या देखेगी?
क्या महत्वपूर्ण तथ्य जानबूझकर छिपाए गए?
क्या विवाह धोखे या गलत जानकारी के आधार पर हुआ?
क्या पीड़ित को नुकसान पहुंचा?
फैसला – यह धोखे से विवाह करने का मामला है। समझें: धारा ६८ के अनुसार झूठी पहचान या गलत जानकारी देकर विवाह करना अपराध की श्रेणी में आ सकता है।
केस स्टडी – ३: ‘झूठे वादे से संबंध’ (धारा ६९)
एक व्यक्ति ने शादी का वादा कर महिला के साथ संबंध बनाए, जबकि उसकी शुरुआत से विवाह करने की कोई मंशा नहीं थी।
अदालत क्या देखेगी?
क्या आरोपी की नीयत शुरू से गलत थी?
क्या महिला की सहमति झूठे वादे पर आधारित थी?
क्या संबंध धोखे से बनाए गए?
फैसला – यह धोखे से संबंध बनाने का मामला हो सकता है। समझें: धारा ६९ के तहत यदि कोई व्यक्ति झूठे विवाह वादे या धोखे से संबंध बनाता है, तो वह दंडनीय हो सकता है। भारतीय न्याय संहिता यह स्पष्ट करती है कि विवाह और संबंध केवल निजी मामले नहीं, बल्कि कानूनी जिम्मेदारी और विश्वास का विषय भी हैं। धोखा, गलत पहचान और झूठे वादों के जरिए बनाए गए संबंध कानून की नजर में गंभीर परिणाम पैदा कर सकते हैं। यानी, व्यक्तिगत संबंधों में ईमानदारी और सहमति दोनों का कानूनी महत्व है।
(अगले अंक में: धारा ७०, ७१ और ७२ – ‘सामूहिक यौन अपराध और गंभीर परिस्थितियों में सजा’ को आसान उदाहरणों के साथ समझेंगे।)

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