राजेश सरकार / प्रयागराज
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जसरा से सामने आई तस्वीरों ने सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के दावों पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। करोड़ों रुपये खर्च कर गरीबों को मुफ्त दवा और जांच सुविधा देने की बात करने वाला स्वास्थ्य विभाग अब खुद कटघरे में खड़ा दिखाई दे रहा है। अस्पताल परिसर के बाहर कबाड़ के ढेर में बड़ी मात्रा में सरकारी दवाइयां, जांच किट और चिकित्सा सामग्री मिलने से हड़कंप मच गया है।
रविवार को सीएचसी जसरा की बाउंड्री के बाहर जब लोगों ने सरकारी चिकित्सा सामग्री को कूड़े और कबाड़ के बीच बिखरा देखा तो हर कोई हैरान रह गया। जिन दवाइयों और जांच किटों से गरीब मरीजों का इलाज होना चाहिए था, वे धूल और गंदगी में पड़ी मिलीं। यह दृश्य न सिर्फ स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि गरीब मरीजों के अधिकारों के साथ खिलवाड़ की कहानी भी बयान करता है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि अस्पताल में मुफ्त दवाएं उपलब्ध होने के बावजूद मरीजों को बाहर मेडिकल स्टोरों से दवा खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है। इतना ही नहीं, सरकारी जांच सुविधाएं होने के बावजूद मरीजों को निजी पैथोलॉजी सेंटरों पर भेजा जाता है। लोगों का कहना है कि एक तरफ मरीज इलाज के लिए परेशान हैं। दूसरी तरफ सरकारी संसाधन कबाड़ में फेंके जा रहे हैं। ग्रामीणों के मुताबिक यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि कमीशनखोरी और निजी संस्थानों को फायदा पहुंचाने का संगठित खेल हो सकता है। शासन द्वारा भेजी गई दवाइयां और जांच किट मरीजों तक पहुंचने के बजाय स्टोरों में सड़ती रहती हैं और बाद में कबाड़ में फेंक दी जाती हैं। इससे न केवल सरकारी धन की बर्बादी हो रही है बल्कि गरीबों के स्वास्थ्य के साथ भी बड़ा धोखा किया जा रहा है। इसे लेकर लोगों में भारी आक्रोश है। सभी ने पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कर दोषी चिकित्सकों और कर्मचारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि इस व्यवस्था पर समय रहते लगाम नहीं लगी तो सरकारी अस्पताल सिर्फ रेफर सेंटर और निजी मेडिकल कारोबार को बढ़ावा देने का माध्यम बनकर रह जाएंगे। बड़ा सवाल यह है कि क्या स्वास्थ्य विभाग इस मामले में जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई करेगा या फिर गरीबों की दवाएं और जांच किट यूं ही कबाड़ में दम तोड़ती रहेंगी।
