रोहित माहेश्वरी, लखनऊ
लखनऊ में १७ मई को सिविल कोर्ट परिसर के बाहर वकीलों पर हुई पुलिस कार्रवाई अब पूरे उत्तर प्रदेश में न्यायिक व्यवस्था के ठप होने की वजह बन गई है। नगर निगम द्वारा कथित अवैध चैंबर हटाने पहुंचे प्रशासन और विरोध कर रहे अधिवक्ताओं के बीच टकराव इतना बढ़ा कि पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया। इसके बाद प्रदेशभर के वकीलों में भारी आक्रोश पैâल गया। लखनऊ से लेकर वाराणसी, बरेली, मुरादाबाद और पश्चिमी यूपी के कई जिलों में अधिवक्ताओं ने न्यायिक कार्यों का बहिष्कार कर दिया है। सेंट्रल बार एसोसिएशन ने २६ मई तक सामूहिक अवकाश का एलान किया है। वकीलों की मांग है कि दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई हो और अधिवक्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। दूसरी ओर भाजपा सरकार इस पूरे मामले में संवेदनशीलता दिखाने के बजाय प्रशासनिक शक्ति प्रदर्शन में उलझी नजर आई। बुलडोजर और लाठी के सहारे व्यवस्था चलाने की राजनीति अब न्याय व्यवस्था तक पहुंच गई है।
यूपी में ‘स्मार्ट’ सिस्टम पर जनता बेहाल
उत्तर प्रदेश में भीषण गर्मी के बीच बिजली संकट अब सिर्फ तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। राजधानी लखनऊ से लेकर पूर्वांचल और बुंदेलखंड तक घंटों की कटौती ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है। कहीं ट्रांसफॉर्मर फुंक रहे हैं, तो कहीं २०-२० घंटे तक बिजली गायब रहने की खबरें सामने आ रही हैं। जनता सड़कों पर उतर रही है और सरकार अफसरों के निलंबन में व्यस्त दिख रही है। इसी बीच स्मार्ट मीटरों को लेकर भी नाराजगी बढ़ती जा रही है। विपक्ष का आरोप है कि ‘बिजली कम, बिल ज्यादा’ वाली व्यवस्था लागू की जा रही है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस लगातार कह रही हैं कि भाजपा सरकार जनता को राहत देने के बजाय निजी कंपनियों और स्मार्ट मीटर परियोजनाओं को प्राथमिकता दे रही है। बसपा प्रमुख मायावती ने भी बिजली संकट को लेकर सरकार से तत्काल समाधान की मांग की है। सरकार दावा कर रही है कि व्यवस्था सुधारने के लिए बड़े कदम उठाए जा रहे हैं, लेकिन सवाल यही है कि जब जनता अंधेरे में बैठी हो, तब ‘स्मार्ट सिस्टम’ के दावे कितने भरोसेमंद लगते हैं? अगर बिजली रहेगी नहीं, तो स्मार्ट मीटर आखिर किस काम आएंगे? जनता को तकनीक नहीं, सबसे पहले भरोसेमंद बिजली चाहिए।
