मनमोहन
मंच पर माइक सज चुका है। नेताजी ने सिल्क का कुर्ता पहना है और ‘गौ माता की जय’ का नारा लगाते हुए उनका गला भर आया है। चुनावी घोषणापत्रों में आपके लिए ‘कल्याण बोर्ड’ और ‘स्मार्ट गोशालाएं’ बनकर तैयार खड़ी हैं। लेकिन हे गौ मैया! जरा ठहरिए। अगर आपको अपनी असली ‘स्मार्ट’ गति देखनी है, तो राजस्थान के जैसलमेर में रामगढ़ मार्ग पर स्थित उस सरकारी कचरे के ढेर पर आइए, जहां आपके ५०० से ज्यादा बच्चे खुले आसमान के नीचे ‘मोक्ष’ का वीभत्स उत्सव मना रहे हैं।
वाह रे हमारा सिस्टम! जिस देश में गाय को ‘माता’ कहकर वोट बटोरे जाते हैं, उसी जैसलमेर के डंपिंग यार्ड में आपकी लाशें सड़ रही हैं। हमारी श्रद्धा इतनी महान है कि हम आपको सजीव रूप में तो दो वक्त की सूखी घास और पानी नहीं दे पाते, लेकिन आपके मरने के बाद प्लास्टिक के पहाड़ों के बीच, गिद्धों और आवारा कुत्तों के हवाले जरूर कर देते हैं।
भाषणों में जो माता है, वो हकीकत में जैसलमेर के कचरे का ढेर है। जब तक सोशल मीडिया पर इस घोर लापरवाही का वीडियो वायरल नहीं हुआ और बदबू नहीं पैâली, तब तक हमारा प्रशासन ‘अंधा, बहरा और गूंगा’ बना रहा। वीडियो आते ही कलेक्टर साहब ने रिपोर्ट मांग ली और अफसरों ने ठेकेदार को नोटिस थमाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। गोशालाओं के नाम पर करोड़ों का बजट कागजों पर ऐसा दौड़ता है कि जमीन पर गायों को खाने के लिए सिर्फ कचरा ही नसीब होता है। हे गौ मैया! हमें कतई माफ मत करना। हमारी इस दोगली श्रद्धा को अपने खुरों से कुचल देना। हम वो लोग हैं जो जीते जी आपको सड़क पर आवारा घूमने और गाड़ियों से कटने के लिए छोड़ देते हैं और मरने के बाद आपकी लाशों पर राजनीति की रोटियां सेकते हैं। जैसलमेर का यह मंजर देखकर भी हमारी रूह नहीं कांपती, क्योंकि वो बहुत पहले ही मर चुकी है। इस मतलबी इंसानी बस्ती में अगली बार जन्म मत लेना, मैया।
