एम एम एस
रात के घने सन्नाटे में राजा विक्रम ने बरगद के पेड़ से उस शव को उतारा और अपने मजबूत कंधे पर लाद लिया। जैसे ही उन्होंने आगे कदम बढ़ाया, कंधे पर एक अजीब सी सरसराहट हुई। विक्रम ने मुड़कर देखा तो दंग रह गए। बेताल का रूप किसी इंसान का नहीं, बल्कि तांबे के रंग के एक विशाल तिलचट्टे (कॉकरोच) जैसा था, जिसके लंबे एंटिना हवा में हिल रहे थे।
विक्रम ने घृणा और कौतूहल से पूछा, ‘बेताल! तूने अपना यह रूप क्यों बदल दिया? तू चाहता तो किसी भव्य और शानदार व्यक्तित्व वाले इंसान का रूप धर सकता था। इस तिलचट्टे जैसे तुच्छ प्राणी का शरीर क्यों धारण किया? यह तो एक परजीवी है, इसे कहीं भी मसला जा सकता है और यह बेहद गंदी, दुर्गंध युक्त जगह में रहता है!’
इससे पहले कि विक्रम अपना सवाल पूरा करते, बेताल लपककर उनके सामने आ गया और हंसते हुए बोला, ‘विक्रम! तूने राजा होते हुए भी मुझसे यह प्रश्न पूछ लिया? चल, अपनी आंखें बंद कर। तुझे एक देश की कहानी सुनाता हूं।’
विक्रम ने जैसे ही आंखें बंद कीं और पलक झपकाई, वे पृथ्वी से दूर ब्रह्मांड के एक ग्रह तैलपलोक पर पहुंच गए। वहां चारों तरफ कचरे के ऊंचे ढेर, गंदे नाले और बदबूदार कारखाने थे, लेकिन वहां की व्यवस्था बहुत आधुनिक थी। वहां गगनचुंबी इमारतें थीं और संसद भवन भी था। उस पूरे ग्रह पर तिलचट्टों का राज था और वहां कॉकरोच पार्टी की सरकार थी। इस पार्टी का एजेंडा साफ था, ‘पूरे देश को गंदगी और अंधकार में डुबाकर रखो, ताकि कोई हमारे घोटालों को देख न सके।’
तभी तिलचट्टा पार्टी का सर्वोच्च नेता मंच पर भाषण देने आया। वह चिल्लाया, ‘भाइयों, विपक्ष कहता है कि हम देश को बर्बाद कर रहे हैं। लेकिन याद रखो, यह कूड़ा-कचरा ही हमारी ताकत है! यह सब ‘मानव’ लोग हैं!” भीड़ में खड़े राजा विक्रम से यह वैचारिक सड़न बर्दाश्त नहीं हुई। वे भूल गए कि वे एक दूसरे ग्रह पर हैं और अपनी न्यायप्रिय गरिमा में आकर उस नेता को सीधे टोकते हुए बोले, ‘अरे ओ राजा! जरा यह तो बता कि जनता को गुमराह क्यों कर रहा है?’
पूरी तिलचट्टा संसद में भयानक सन्नाटा पसर गया। सारे तिलचट्टों में गहरा रोष (गुस्सा) पैदा हो गया। उन्हें लगा कि मानव कहकर उनका घोर अपमान किया गया है।
वहां के राजा ने मंच से चीखकर कहा, ‘इसने मुझे मानव पुकारने का दुस्साहस वैâसे किया? मानव? वह प्रजाति जो रोशनी का ढोंग करती है, जो खुद को साफ कहकर अंदर से सबसे ज्यादा मैली है? जो लालच में अपनी ही धरती को नष्ट कर रही है? हमें मानव कहना हमारी महान तिलचट्टा संस्कृति पर कलंक है! हम वो हैं जो परमाणु बम के रेडिएशन में भी जिंदा रह सकते हैं!’
इस अपमान की आग में जलकर, तिलचट्टा पार्टी के तौर-तरीकों से नाराज कुछ विद्रोही तिलचट्टों ने उसी वक्त एक नई राजनीतिक पार्टी के गठन का एलान कर दिया। तिलचट्टा पार्टी की तर्ज पर ही इस नई पार्टी का नाम रखा गया ‘मानव पार्टी’।
यह नाम जनता को चिढ़ाने और व्यवस्था को बदलने के प्रतीक के रूप में चुना गया। उन्होंने नारा दिया: ‘हम इस तिलचट्टा संस्कृति को बदलेंगे, हम मानवों की तरह नया सवेरा लाएंगे!’ हालांकि, भीतर से वे भी उसी नाली के तिलचट्टे थे, बस सत्ता पाने के लिए उन्होंने मानव होने का मुखौटा पहन लिया था। अब दोनों पार्टियों में सत्ता के लिए घमासान छिड़ गया। अचानक दृश्य बदला और विक्रम ने खुद को वापस श्मशान के रास्ते पर पाया। बेताल फिर से शव के रूप में उनके कंधे पर था।
बेताल ने कहा, ‘राजन! अब मेरा प्रश्न सुन। जब किसी देश की राजनीति में नेता गंदगी और अवसरवाद को ही अपनी शक्ति बना लें और जनता भी उसी में जीने की आदी हो जाए, तो वहां तिलचट्टा पार्टी राज करती है। और जब जनता बदलाव चाहती है, तो उन्हीं के बीच से कुछ लोग मानव पार्टी का नया मुखौटा पहनकर आ जाते हैं, पर उनका चरित्र नहीं बदलता।
अब बता राजन, इस व्यवस्था में असली दोषी कौन है? वह तिलचट्टा नेता जो गंदगी पैâलाता है या वह जनता जो बदलाव के नाम पर सिर्फ नया मुखौटा चुन लेती है? यदि तूने जानते हुए भी उत्तर नहीं दिया, तो आपकी प्रतिज्ञा टूट जाएगी और आपका सिर फट जाएगा।’
अब विक्रम धर्मसंकट में थे। यदि वे चुप रहते, तो न्याय का गला घुटता और उनका सिर फट जाता। अपनी प्रतिज्ञा और बुद्धिमत्ता की रक्षा के लिए विक्रम को मजबूरन बोलना पड़ा। विक्रम ने कहा, ‘बेताल! असली दोषी वह जनता है। नेता तो वही रूप धरेगा, जिसमें उसका स्वार्थ सिद्ध हो। जब तक जनता बाहरी मुखौटों (जैसे मानव पार्टी) के झांसे में आती रहेगी और खुद अपनी सोच साफ नहीं करेगी, तब तक शासक केवल नाम बदलेंगे, चरित्र नहीं। राजनीति में कोई भी प्राणी तुच्छ नहीं होता, जो हर गंदगी में जिंदा रहना सीख जाए, वही सबसे बड़ा राजनेता बन जाता है।’
बेताल खिलखिलाकर हंसा, ‘सत्य कहा राजन! तूने बिल्कुल सही न्याय किया। परंतु, तू बोल पड़ा! और हमारी शर्त के अनुसार, जैसे ही तू बोलेगा, मैं तेरे हाथ से निकल जाऊंगा।’
इसके साथ ही बेताल विक्रम के कंधे से झटका मारकर छूटा और घने अंधेरे में उड़ता हुआ वापस पेड़ पर जा लटका। विक्रम ने एक गहरी सांस ली, तलवार संभाली और दृढ़ कदमों से दोबारा उस पेड़ की तरफ बढ़ चले, ताकि अपने कर्तव्य को पूरा कर सकें।
