मुख्यपृष्ठसंपादकीयसंपादकीय : डरपोक; डरपोक कहीं के!

संपादकीय : डरपोक; डरपोक कहीं के!

देश में महंगाई चरम पर पहुंच चुकी है, लेकिन महंगाई ने कोहराम मचा रखा है, महंगाई ने जीना मुहाल कर दिया है, ऐसा बोलना या महंगाई पर अपनी राय रखना सरकार ने गुनाह घोषित कर दिया है। केंद्र सरकार को यह डर सता रहा है कि महंगाई की वजह से लोगों की भावनाएं भड़क उठेंगी और जनता सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आएगी। यह पूरी तरह से डरपोक होने की निशानी है। पिछले आठ दिनों में बारह बार पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाए गए। पेट्रोल-डीजल की इस महंगाई की मार सीधे तौर पर तमाम जरूरी चीजों पर पड़ती है। सरकार इस कदर खौफजदा है कि उसने ‘पीपली लाइव’ फिल्म के गाने, ‘महंगाई डायन खाए जात है’ पर ही पाबंदी लगा दी है। इसका सीधा मतलब यही हुआ कि महंगाई की आग में जलकर मर जाओ, लेकिन मुंह से दर्द की एक आह तक मत निकालो। इस सरकार को महा-डरपोक ही कहना पड़ेगा। यह सरकार आजाद ख्यालों वाले पत्रकारों से डर गई, यह सरकार अपने आलोचकों से डर गई, यह सरकार कार्टूनिस्टों से डर गई। सरकार मिमिक्री और स्टैंड-अप कॉमेडियनों से इतनी घबरा गई कि उन्हें उठाकर जेल में डाल दिया। सरकार अपने राजनीतिक विरोधियों से डरती है और उनके पीछे ईडी तथा सीबीआई लगा देती है। यह सरकार पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे से खौफ खाती है और इसीलिए इन राज्यों के चुनावों पर ही डाका डाल देती है। सरकार ने ‘ऑनलाइन’ कॉकरोच जनता पार्टी को धमकियां दीं और अब महंगाई पर बने गाने पर पाबंदी लगाकर खुद को एक डरा हुआ तानाशाह साबित कर दिया। तानाशाह असल में डरपोक ही होता है। यदि चार लोग आपस में चर्चा भी कर रहे हों तो तानाशाह डर जाता है; उसे लगता है कि उसके खिलाफ कोई गहरी साजिश रची जा रही है। सच तो यह है कि जिस ‘महंगाई’ के गाने पर आज मोदी-भाजपा ने पाबंदी लगाई है, उसी गाने के दम पर ये ‘डरपोक’ सत्ता की कुर्सी तक पहुंचे थे। सुषमा स्वराज और स्मृति ईरानी समेत भाजपा के तमाम बड़े नेता महंगे प्याज, दूध और सिलेंडर जैसे मुद्दों पर सड़कों पर उतरे थे। उन्होंने संसद सिर पर उठा ली थी। कांग्रेस के कार्यकाल में महंगाई के खिलाफ हुए आंदोलनों या ऐसे गानों पर पाबंदी लगाकर कभी
लोकतंत्र का गला घोंटने
का कोई रिकॉर्ड नहीं है, लेकिन मौजूदा सरकार जनभावनाओं के पूरी तरह खिलाफ है इसलिए बुरी तरह डरी हुई है। अगर सरकार एक व्यंग्यात्मक गाने से इतना खौफ खाने लगे तो यह हमारे लोकतंत्र के लिए कतई अच्छा संकेत नहीं है। व्यंग्य, आलोचना और असहमति से डरनेवाली सरकार मानसिक रूप से कभी स्थिर नहीं हो सकती, बल्कि वह हमेशा लड़खड़ाई हुई हालत में नजर आती है। उनके चेहरों पर दिखने वाला भरोसा सरासर झूठा होता है। हिटलर खुद को बहुत ताकतवर नेता समझता था, लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के दौरान डेविड लो के धारदार कार्टूनों ने उसकी रातों की नींद उड़ा दी थी। उसने बाकायदा यह फरमान जारी किया था ‘कार्टूनिस्ट लो को जिंदा या मुर्दा मेरे सामने पेश करो’। यह एक तानाशाह के डरपोक होने का पुख्ता सबूत है। हिटलर जैसे लोग ऊपर से खुद को मजबूत दिखाते हैं, पर असल में वे अंदर से बेहद बुजदिल होते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि जिस देश पर वे जबरन राज करते हैं, उसी देश की जनता से वे सबसे ज्यादा डरते हैं। इसी डर के मारे वे लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की आजादी, चुनाव प्रणाली और अदालत जैसी संस्थाओं को अपने कब्जे में ले लेते हैं। भारत में इस वक्त ठीक ऐसा ही चल रहा है। ‘पीपली लाइव’ फिल्म जब २०१० में रिलीज हुई थी, तब प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह थे। इस फिल्म में रघुवीर यादव की आवाज में गाए गए गाने की लाइन, ‘सखी सइयां तो खूब ही कमात हैं, महंगाई डायन खाए जात है…’ आम आदमी की जिंदगी की कड़वी सच्चाई को बयां करती है। पति जी-तोड़ मेहनत करता है, पेट भरने लायक कमाने की कोशिश करता है, लेकिन महंगाई सब कुछ निगल जाती है। जब-जब महंगाई का यह राक्षस तांडव करता है, तब-तब इस गाने की याद आती है। आज भी महंगाई ने आम इंसान का जीना हराम कर रखा है, ऐसे में देश के लोगों को अगर इस गाने की याद आई, तो भला इसमें उनका क्या कसूर है? मगर केंद्र सरकार की नीति यही है कि इस गाने को याददाश्त से मिटा दिया जाए। अभिनेता आमिर खान प्रोडक्शंस के हैंडल पर पोस्ट किया गया यह गाना कुछ ही देर में डिलीट कर दिया गया। साफ है कि इसके पीछे भी सरकार का ही दबाव और तानाशाही है। हकीकत में, यह सिर्फ किसी फिल्म का गाना नहीं है, बल्कि पिछले कई सालों से जनता के
असंतोष का प्रतीक
बना हुआ है। भाजपा को कभी यह गाना बहुत पसंद था, लेकिन अब उनकी सरकार को यह गाना और इसके जरिए निकलने वाला गुस्सा बर्दाश्त नहीं हो रहा है। महंगाई के खिलाफ अगर जनता में नाराजगी है, तो सरकार को उस नाराजगी को दबाना नहीं चाहिए। सोशल मीडिया से इस गाने को हटा देने से महंगाई खत्म नहीं हो जाएगी; उल्टे जनता के दिलों का गुबार और तेजी से भड़क उठेगा। राहुल गांधी ने दावा किया है कि देश में भारी असंतोष है और इस आक्रोश की चिंगारी मोदी सरकार को अगले एक साल के भीतर ही सत्ता से उखाड़ फेंकेगी। यह पूरी तरह सच है। राहुल गांधी ने अब तक जितनी भी भविष्यवाणियां और दावे किए हैं, वे सब सच साबित हुए हैं। अगर इस सच को स्वीकार कर लिया जाए, तो मोदी की इस दमनकारी सत्ता का सालभर में पतन होना तय है। खुद सरकार को भी अब इस बात का अहसास हो चुका है, इसीलिए उन्होंने महंगाई के खिलाफ उठनेवाली आवाजों को कुचलना शुरू कर दिया है। मोदी अब विदेशी ताकतों की कठपुतली बनकर रह गए हैं। अमेरिका के विदेश मंत्री पिछले दिनों भारत आए और उन्होंने खुद ही यह एलान कर दिया कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति अगले हफ्ते भारत के दौरे पर आएंगे और र्इंधन (तेल) की खरीद को लेकर भारत के साथ समझौता करेंगे। वेनेजुएला के राष्ट्रपति भारत आ रहे हैं, यह न तो भारत को पता है और न ही खुद वेनेजुएला की सरकार को, लेकिन इसकी घोषणा कोई तीसरा देश कर रहा है। इससे साफ जाहिर होता है कि भारतीय प्रधानमंत्री की हैसियत आज क्या रह गई है। अंतर्राष्ट्रीय दबाव के डर से प्रधानमंत्री मोदी के पैर कांप रहे हैं। भारत में भले ही वे विपक्षी दलों और जनता पर अपना ‘रौब’ झाड़ रहे हों, लेकिन यह सिर्फ ऊपरी दिखावा है। मोदी और उनके लोग कभी भी बहादुरों की श्रेणी में नहीं आते थे; वे सिर्फ बहादुरी का मुखौटा लगाकर राज कर रहे थे। गलत हथकंडों से चुनाव जीतने का जो आत्मविश्वास उन्होंने हासिल किया था, उसी के दम पर जनता को हमेशा डर के साए में रखा। लेकिन डर के खंभों पर टिकी भाजपा की सत्ता का यह महल अब ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा। ‘महंगाई’ के गाने पर लगाई गई यह पाबंदी तो बस एक शुरुआत है। डरपोक कहीं के!

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