-५७ प्रतिशत कंपनियां कर रही हैं भर्ती प्रक्रिया में एआई का यूज
-शोधकर्ताओं ने कहा, ‘यह एल्गोरिदमिक अन्याय’ है
सामना संवाददाता / मुंबई
अगर आप नौकरी की तलाश में हैं, तो अब सिर्फ अच्छा बायोडाटा काफी नहीं है। बदलते दौर में नौकरी पाने के लिए यह जानना भी जरूरी हो गया है कि कंपनी किस एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) टूल का इस्तेमाल कर रही है। अमेरिकी टेक कंपनी एनविडिया के मुख्य सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट जोनाथन रॉस ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। उनका कहना है कि ‘एआई को अपना ही एआई पसंद आता है।’
न्यूयॉर्क में आयोजित ‘सोहन इन्वेस्टमेंट कॉन्प्रâेंस २०२६’ में बोलते हुए जोनाथन रॉस ने बताया कि आजकल बड़ी कंपनियां उम्मीदवारों के रिज्यूम छांटने के लिए एआई आधारित सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल कर रही हैं। ये एआई टूल उन्हीं रिज्यूम को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं, जो उसी लार्ज लैंग्वेज मॉडल यानी एलएलएम से तैयार किए गए हों, जिसका उपयोग भर्ती प्रक्रिया में किया जा रहा है। रॉस के मुताबिक, अगर कोई उम्मीदवार ओपनएआई के चैटजीपीटी या क्लॉड जैसे एआई टूल की मदद से रिज्यूम बनाता है तो उसके चुने जाने की संभावना बढ़ जाती है। उन्होंने सलाह दी कि उम्मीदवारों को अलग-अलग एआई मॉडल से कई रिज्यूम तैयार करने चाहिए, ताकि इंटरव्यू के लिए शॉर्टलिस्ट होने की संभावना अधिक रहे। साल २०२५ में तीन विश्वविद्यालयों द्वारा किए गए एक शोध में भी यह खुलासा हुआ कि जिन उम्मीदवारों ने वही एआई टूल इस्तेमाल किया, जो भर्ती करने वाली कंपनी उपयोग कर रही थी, उनके चयनित होने की संभावना २३ से ६० प्रतिशत तक अधिक थी। शोधकर्ताओं ने इसे ‘एल्गोरिदमिक अन्याय’ बताया।
सही टूल चुनना जरूरी
‘रिज्यूम डॉट ओआरजी’ के सर्वे के अनुसार, अब ५७ प्रतिशत कंपनियां भर्ती प्रक्रिया में एआई का इस्तेमाल कर रही हैं। इनमें से ७४ प्रतिशत कंपनियों के एआई टूल बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के उम्मीदवारों को सीधे रिजेक्ट भी कर सकते हैं। ऐसे में अब नौकरी पाने के लिए सिर्फ योग्यता नहीं, बल्कि सही एआई टूल चुनना भी बेहद अहम हो गया है।
