उमा सिंह
देश का युवा आज किताबों से ज्यादा व्यवस्था की मार झेल रहा है। मेहनत, सपने और उम्मीदों के सहारे परीक्षा केंद्र तक पहुंचने वाले छात्रों को जब पेपर लीक और परीक्षा रद्द होने की खबर मिलती है, तब केवल उनका समय नहीं, बल्कि उनका भरोसा भी टूट जाता है। उनके माता-पिता अपनी जरूरतें काटकर फीस भरते हैं, कोचिंग का खर्च उठाते हैं और बच्चों के सपनों को सहारा देते हैं। लेकिन जब परीक्षा केंद्र पर पहुंचने के बाद यह कहा जाता है कि ‘पेपर लीक हो गया, परीक्षा रद्द है’, तब केवल एक परीक्षा नहीं टूटती, बल्कि लाखों उम्मीदें बिखर जाती हैं। एसएससी जीडी परीक्षा रद्द होने के बाद रोती हुई छात्रा की तस्वीर ने एक बार फिर देश की शिक्षा व्यवस्था और सरकारी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
एसएससी जीडी परीक्षा रद्द होने के बाद एक छात्रा का फूट-फूटकर रोना केवल उसकी व्यक्तिगत पीड़ा नहीं है, बल्कि यह पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था पर लगा एक सवाल है। वह छात्रा कह रही थी कि ‘हम सुबह ४:३० बजे से निकले हैं, बहुत प्रेशर है, लेकिन इन लोगों को कोई मतलब नहीं।’ यह वाक्य उस दर्द को दिखाता है जिसे सत्ता में बैठे लोग शायद महसूस नहीं कर पा रहे हैं। आज प्रतियोगी परीक्षाएं मेहनत और योग्यता का नहीं, बल्कि अव्यवस्था और भ्रष्टाचार का प्रतीक बनती जा रही हैं। कभी नीट में धांधली, कभी भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक, तो कभी अंतिम समय में परीक्षा रद्द। सवाल यह है कि आखिर युवाओं के भविष्य के साथ यह खिलवाड़ कब तक चलता रहेगा? ऐसे में यह सवाल जहन में आता है कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का ‘पढ़ेगा इंडिया तभी तो बढ़ेगा इंडिया’ का सपना आखिर कैसे सार्थक होगा, जब छात्रों को मेहनत से ज्यादा सिस्टम की लापरवाही और पेपर लीक का डर सताने लगे? यदि युवाओं का भरोसा लगातार टूटता रहा, तो यह केवल शिक्षा व्यवस्था की नहीं, बल्कि देश के भविष्य की सबसे बड़ी विफलता साबित होगी। शिक्षा किसी भी देश की रीढ़ होती है। यदि छात्र का भरोसा ही टूट जाए तो देश का भविष्य कैसे मजबूत होगा? एक गरीब परिवार का बच्चा सालों तक तैयारी करता है, लेकिन कुछ लालची लोग पैसे के लिए पूरा सिस्टम बेच देते हैं। इससे सिर्फ परीक्षा नहीं रद्द होती, बल्कि मेहनत पर विश्वास भी खत्म होता है। सरकारों को समझना होगा कि पेपर लीक केवल प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि सामाजिक अपराध है।
