अनिल तिवारी, मुंबई
देश में आम आदमी की जिंदगी लगातार कठिन होती जा रही है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी, रसोई का बढ़ता खर्च, इलाज और शिक्षा की महंगाई, नौकरी की अनिश्चितता और पेंशन की असुरक्षा, ये वे सवाल हैं, जो सीधे जनता के घर और जेब से जुड़े हैं। लेकिन विडंबना यह है कि जब महंगाई गले से ऊपर पहुंचने लगती है, तब सार्वजनिक बहस का केंद्र अक्सर धार्मिक और राजनीतिक मुद्दों की ओर मोड़ दिया जाता है।
राजनीतिक औजार
इस बार बकरीद की छुट्टी, पशु-वध के नियम, सड़क पर नमाज, अजान और घुसपैठ जैसे मुद्दों ने महंगी जिंदगी के असली संकट को पीछे धकेल दिया है।
पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद तीन राज्यों में सत्ता परिवर्तन हुआ और उसका असर प्रशासनिक पैâसलों में भी दिखाई देने लगा। केरल में बकरीद पर २७ और २८ मई को दो दिन, पश्चिम बंगाल में दो दिन से घटाकर एक दिन, केंद्र सरकार ने भी एक दिन; यूपी, बिहार, राजस्थान, गुजरात, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश सहित अधिकतर राज्यों में २८ मई को एक दिन छुट्टी रहेगी, जबकि जम्मू-कश्मीर और महाराष्ट्र जैसे स्थानों पर चांद के आधार पर २७ मई की तारीख भी चर्चा में है। यानी धार्मिक पर्व अब केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि प्रशासनिक और राजनीतिक व्याख्या का मुद्दा भी बन गए हैं।
पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार बनने के बाद बुलडोजर कार्रवाई और बकरीद से पहले पशु-वध के सख्त नियमों को लेकर तृणमूल कांग्रेस तथा मुस्लिम नेताओं ने विरोध तेज किया है। हुमायूं कबीर जैसे नेताओं ने सरकारी आदेशों पर सवाल उठाए हैं। इसके जवाब में राज्य की मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने तीखा रुख अपनाते हुए कहा कि बंगाल में रहना है तो राज्य का कानून मानना होगा। ऐसी भाषा बताती है कि प्रशासनिक आदेश अब केवल कानून व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गए, बल्कि पहचान और बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक राजनीति के औजार बनते जा रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में भी बकरीद से पहले धार्मिक आचरण पर बयानबाजी तेज है। शिया धार्मिक नेता मौलाना सैफ अब्बास ने संयमित बात कही कि कुर्बानी उन्हीं जानवरों की होनी चाहिए, जिनकी अनुमति कानून देता है। उन्होंने गाय की कुर्बानी को इस्लाम की भावना के विरुद्ध बताया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा सड़कों पर नमाज को लेकर दी गई चेतावनी पर डॉ. उमर अहमद इलियासी ने कहा कि नमाज मस्जिदों में ही अदा की जानी चाहिए। वहीं अजान पर टिप्पणी के जवाब में मौलाना यासूब अब्बास ने कहा कि शोर की समस्या हो तो सभी धार्मिक ध्वनियों को समान कसौटी पर देखा जाना चाहिए।
ध्यान हटाने का जरिया
इसी बीच केंद्र सरकार ने अवैध घुसपैठियों के खिलाफ सख्त अभियान के संकेत देकर महंगाई से भटकाव का एक और मुद्दा दे दिया। असम, बंगाल और त्रिपुरा में बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक विमर्श में रहा है। अवैध घुसपैठ निश्चय ही राष्ट्रीय सुरक्षा का गंभीर विषय है, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या ऐसे मुद्दे महंगाई, बेरोजगारी और आम आदमी की टूटती आर्थिक रीढ़ से ध्यान हटाने का माध्यम बन रहे हैं?
जमीन की हकीकत बेहद कठोर है। पेट्रोल-डीजल महंगा होने से यात्रा, परिवहन और रोजमर्रा की वस्तुएं महंगी हो रही हैं। परिवार खर्च काट रहे हैं, इलाज टाल रहे हैं, बच्चों की जरूरतें घटा रहे हैं। इसी आर्थिक और मानसिक दबाव का दर्द मेरठ के रिटायर्ड पत्रकार राजेश अवस्थी की दुखद मृत्यु में दिखाई देता है। दशकों तक अखबारों में काम करने के बाद भी रिटायरमेंट के समय सीमित वेतन, मामूली फंड, कम पेंशन, बीमारी, मकान की किश्त और पारिवारिक जिम्मेदारियों ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया। यह केवल एक पत्रकार की कहानी नहीं, छोटे शहरों के हजारों ईमानदार कर्मचारियों और पत्रकारों की त्रासदी है। आम लोगों की दास्तान है जो आए दिन या तो खुद का या पूरे परिवार का जीवन खत्म कर रहे हैं।
आज भी अनेक मध्यवर्गीय कर्मचारी २० से ३० हजार रुपए में घर चला रहे हैं। रिटायरमेंट के बाद न पर्याप्त पेंशन, न स्वास्थ्य सुरक्षा, न संस्थागत सहारा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या धार्मिक बहसें, छुट्टियों की राजनीति, पशु-वध नियम और पहचान की टकराहटें रोटी, रोजगार, इलाज और बुढ़ापे की सुरक्षा से बड़ी हैं?
लोकतंत्र की विफलता
राजनीति को समझना होगा कि जनता केवल भावनात्मक मुद्दों पर नहीं जीती। उसे पेट्रोल चाहिए, रोटी चाहिए, इलाज चाहिए, सम्मानजनक वेतन चाहिए और बुढ़ापे में सुरक्षा चाहिए। बकरीद, अजान, नमाज, कांवड़ और घुसपैठ अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण विषय हो सकते हैं, लेकिन महंगी जिंदगी से जूझते नागरिक के लिए सबसे बड़ा धर्म है, सम्मान से जीने का अधिकार। यही अधिकार कमजोर पड़ता है तो लोकतंत्र की असली विफलता सामने आती है।
