मुख्यपृष्ठस्तंभफलसफा: बचपन की चुप्पी, उम्रभर का दर्द

फलसफा: बचपन की चुप्पी, उम्रभर का दर्द

सना खान

कुछ बच्चे बचपन में ही अपनी आवाज धीमी कर लेते हैं। वो बोलने से पहले सोचते हैं। रोने से पहले खुद को रोकते हैं और हंसते वक्त भी ये देखने लगते हैं कि कहीं कोई नाराज तो नहीं हो जाएगा। कई बच्चों का बचपन खिलौनों से नहीं, घर के माहौल से तय होता है। अगर घर में हर वक्त डर हो, आवाजें ऊंची हों, भावनाओं को ‘ड्रामा’ कहा जाए तो बच्चे धीरे-धीरे अपनी तकलीफ छुपाना सीख जाते हैं। फिर वो ‘मैं ठीक हूं’ कहना सीख जाते हैं। भले ही अंदर से बिल्कुल ठीक न हों। कुछ बच्चे अपनी कॉपियों में नहीं, अपने मन में गलतियां ढूंढ़ने लगते हैं। उन्हें हर वक्त लगता है कि शायद वो ही समस्या हैं शायद वो ही काफी अच्छे नहीं हैं और यही एहसास धीरे-धीरे उनके पूरे व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाता है। फिर वही बच्चे बड़े होकर भी हर बात पर माफी मांगते, अपनी पसंद छुपाते हैं। लोगों को नाराज करने से डरते हैं और हर रिश्ते में खुद को साबित करते रहते हैं। क्योंकि उन्हें बचपन से बिना शर्त अपनापन महसूस ही नहीं हुआ होता। कुछ लोग आज भी जोर से बोलने वालों से डर जाते हैं थोड़ी नाराजगी देखकर घबरा जाते हैं अपनी बात कहने से पहले सौ बार सोचते हैं और उन्हें खुद भी नहीं पता होता कि ये डर दरअसल उनके बचपन से आया है। सबसे दर्दनाक बात यह है कि कई बच्चे अपनी तकलीफ बताना इसलिए छोड़ देते हैं, क्योंकि उन्हें यकीन ही नहीं रहता कि कोई उन्हें सच में समझेगा। फिर वो चुप हो जाते हैं इतने चुप कि लोग उन्हें ‘बहुत समझदार’ कहने लगते हैं। जबकि सच यह होता है कि वो सिर्फ अपनी भावनाओं के साथ अकेले रहना सीख चुके होते हैं। बच्चों को हमेशा सलाह नहीं चाहिए होती, कई बार उन्हें सिर्फ एक ऐसी जगह चाहिए होती है, जहां वो बिना डर के अपनी बात कह सकें। बिना शर्म के रो सकें और बिना किसी शर्त के अपनापन महसूस कर सकें। क्योंकि बचपन में मिला व्यवहार सिर्फ उस उम्र तक सीमित नहीं रहता। वो इंसान के बोलने, सोचने, डरने और खुद को देखने का तरीका बन जाता है। कुछ बच्चे बचपन में सिर्फ चुप नहीं होते, वो धीरे-धीरे अंदर से अकेले हो जाते हैं।
(अगर बचपन में उनकी मानसिक स्थिति को नजरअंदाज किया जाए तो वही दर्द, बड़े होकर बेचैनी, असुरक्षा और खामोशी बन जाता है। इसलिए बच्चों को सिर्फ सफल बनाना जरूरी नहीं, उन्हें भावनात्मक रूप से मजबूत और स्वस्थ बनाना भी उतना ही जरूरी है।)

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