मुख्यपृष्ठस्तंभलोगों की छोड़िए, अपनी बेटी को बचाइए!

लोगों की छोड़िए, अपनी बेटी को बचाइए!

मनमोहन सिंह

इस समाज की ऐसी की तैसी…लोग जाएं भाड़ में… पहले अपनी बेटी की जान बचाइए! इस पहली पंक्ति को पढ़कर आपको गुस्सा आया होगा या फिर नाराजगी हुई होगी… रिएक्शन जरूरी है! सोमा आचार्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो नसीहत दी है, उसे हमने बड़े जुतियाने वाले अंदाज में लिखा है! लोग यानी इंसानों का एक समूह जिससे समाज बनता है…
अरे चूल्हे में जाए ऐसा समाज और भाड़ में जाएं ऐसे लोग! आपकी झूठी प्रतिष्ठा, खोखली इज्जत और इस सड़े-गले समाज की नाक ऊंची रखने के लिए क्या अब बेटियों की लाशों के ढेर लगाए जाएंगे? समाज को अपने जूते की नोक पर रखिए और अपनी आंखें खोलकर देखिए कि आप अपनी ही बेटी, अपने ही जिगर के टुकड़े, अपने खुद के खून को किस दलदल में धकेल रहे हैं। ‘लोग क्या कहेंगे’, इस एक आत्मघाती जुमले ने इस देश में जितनी बेटियों को श्मशान पहुंचाया है, उतना तो किसी महामारी ने भी नहीं मारा होगा।
आखिर कब तक हम ‘खानदान की आन’ के नाम पर अपनी जीती-जागती बच्चियों की बलि देते रहेंगे? क्या हमारी मर्यादा इतनी कमजोर है कि वह एक बेटी की जिंदगी से भी बड़ी हो गई? धिक्कार है ऐसी झूठी शान पर, जो अपनी ही औलाद की चीखों को अनसुना कर दे। जब आपकी बेटी ससुराल की प्रताड़ना से टूटकर आपके दरवाजे पर संरक्षण मांगने आती है, तो उसे ‘लाज-शर्म’ का वास्ता देकर वापस मत भेजिए। वह आपसे मदद की भीख मांग रही होती है और आप उसे वापस मौत के कुएं में ढकेल देते हैं। यह वैâसी बेबसी है और वैâसा यह पितृ सत्तात्मक अंधापन है?
आप अपनी फूल जैसी बच्ची को विदा नहीं कर रहे, बल्कि उसे भेड़िए के उस जंगल में खुद अपने हाथों से फेंककर आ रहे हैं, जहां इंसान के चोले में खूंखार शैतान रहते हैं। (माफ करना ‘शैतानों’ हमने कभी आपको देखा नहीं! हो सकता है यहां ‘शैतान’ शब्द का इस्तेमाल हम आपका भी अपमान कर रहे हों!) ये वो दिंरदे हैं जो चंद रुपयों, एक गाड़ी या एक अदद टीवी के लिए एक बेटी की बोटी-बोटी नोचने से भी नहीं झिझकते।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े हमारी सामूहिक मर्दानगी और ममता पर थूकते हैं। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदुस्थान में हर रोज औसतन १८ से २० बेटियां दहेज की वेदी पर चढ़ा दी जाती हैं। हर साल करीब ७,००० मौतें! क्या ये आंकड़े आपकी रूह को नहीं झकझोरते?
दहेज की भेंट चढ़ी उस मासूम बच्ची का तड़पना, उसकी चीखें और उसका असह्य दर्द सिर्फ वह खुद, उसके मां-बाप और उसका परिवार भुगतता है। वो समाज नहीं, जिसे खुश करने के लिए आपने उसे उस नरक में धकेला था, जिसे दुनिया ‘ससुराल’ कहती है। जब निर्जीव बेटी की लाश घर आएगी, तो यही ‘लोग’, यही ‘समाज’ दो मिनट का अफसोस जताकर अपनी चाय की चुस्कियों में मसरूफ हो जाएंगे या बीड़ी सिगरेट का धुआं उड़ते हुए बेगैरत नसीहतें देंगे! कोई आपके आंसू पोंछने नहीं आएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल ही में सोमा आचार्य के मामले पर समाज के इस खोखलेपन को पूरी तरह नंगा कर दिया है। अदालत ने साफ कहा कि ‘समझौते’ और ‘लोक-लाज’ की सनक ने एक और बेटी को मौत के मुंह में धकेल दिया गया। बार-बार शिकायत के बाद भी समाज के ठेकेदारों ने उसे उसी नरक में वापस भेजा, जहां उसकी बेरहमी से हत्या कर दी गई।
अब बहुत हुआ! अपनी बेटियों को ‘बर्दाश्त’ करने की घुट्टी पिलाना बंद कीजिए। उन्हें भेड़ियों के आगे घुटने टेकना नहीं, बल्कि उनका जबड़ा फाड़ना सिखाइए। इस समाज और इसकी झूठी इज्जत को लात मारिए। अगर आपकी बेटी प्रताड़ित है, तो उसे उस नरक से खींचकर वापस घर लाइए। उसकी डोली उठने के बाद उसका जनाजा उठने का इंतजार मत कीजिए। इस समाज की ऐसी की तैसी…लोग जाएं भाड़ में… पहले अपनी बेटी की जान बचाइए!

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