मुख्यपृष्ठस्तंभदेस-परदेस: वाह रे अमेरिका की ‘ईमानदारी'

देस-परदेस: वाह रे अमेरिका की ‘ईमानदारी’

मनमोहन सिंह

दुनिया में चल रहा हो युद्धविराम, लेकिन अंकल सैम का हाथ तो हमेशा ट्रिगर पर ही रहता है। एक तरफ शांति की शहनाई बज रही है, तो दूसरी तरफ अमेरिका ने दक्षिणी ईरान में मिसाइल ठिकानों और बारूदी सुरंग बिछाने वाली नावों पर दनादन मिसाइलें दाग दीं।
जब दुनिया ने पूछा कि भाई तुम सीजफायर में ये क्या कर रहे हो, तो अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रवक्ता टिम हॉकिन्स ने बड़े ही मासूम चेहरे के साथ कहा, ‘अरे, हम तो बस सेल्फ डिफेंस में संयम बरत रहे थे।’ अब बताइए, ऐसी संयम वाली गोलाबारी तो सिर्फ अमेरिका ही कर सकता है।
एक तरफ अमेरिकी नौसेना ने ईरान के बंदरगाहों की ऐसी नाकेबंदी की है कि बेचारे ईरान का व्यापार ठप्प पड़ा है, करीब १०० जहाजों को रास्ता बदलना पड़ा और चार तो काम के ही नहीं बचे। और दूसरी तरफ, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप साहब अपने ट्रूथ सोशल पर बैठकर बड़े प्यार से पोस्ट लिख रहे हैं,‘ईरान के साथ बातचीत बहुत अच्छी चल रही है।’
इसे कहते हैं असली कन्फ्यूजन। ट्रंप जी का कहना है कि या तो ऐसा शानदार समझौता होगा, जो इतिहास रच देगा या फिर ऐसी धाकड़ लड़ाई होगी कि सब देखते रह जाएंगे। मतलब, एक हाथ में शांति का सफेद गुलाब है और दूसरे हाथ में सबके लिए बड़ा खतरा। ऊपर से वो सऊदी, कतर और पाकिस्तान को भी अब्राहम अकॉर्ड्स की पार्टी में बुला रहे हैं।
अमेरिका की इस ईमानदारी को २१ तोपों की सलामी है। जहां शांति समझौते की मेज पर चाय की चुस्कियां ली जा रही हैं, वहीं बैकग्राउंड में मिसाइलों के पटाखे फोड़े जा रहे हैं। भगवान बचाए ऐसी शांति और ऐसी ईमानदारी से, जहां सीजफायर का मतलब ही होता है ,‘बॉस हम जब चाहें, तब फायर करेंगे।’

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