मुख्यपृष्ठस्तंभरुख-ए-सियासत: देश अर्थशास्त्र से चलता है इवेंट मैनेजमेंट से नहीं!

रुख-ए-सियासत: देश अर्थशास्त्र से चलता है इवेंट मैनेजमेंट से नहीं!

तौसीफ कुरैशी

भारत ने कई बार बुरे दिन देखे हैं। विदेशी मुद्रा भंडार कभी इतना कम था कि देश मुश्किल से एक महीने का आयात कर सकता था। १९९१ में हालत यह थी कि भारत को अपना सोना गिरवी रखना पड़ा। वह समय देश के आत्मसम्मान पर चोट का समय था। लेकिन तब देश को ऐसे लोग मिले जो पढ़े-लिखे थे, अर्थशास्त्र समझते थे और भाषणों से ज्यादा नीतियों पर भरोसा करते थे।
पी़ वी. नरसिम्हा राव और डॉ. मनमोहन सिंह ने उस संकट में अर्थव्यवस्था को संभाला। सुधार किए गए। दुनिया के लिए दरवाजे खुले। उद्योग बढ़े, रोजगार बढ़े, विदेशी निवेश आया। यही कारण था कि २००४ से २०१४ के बीच भारत का विदेशी मुद्रा भंडार कई गुना बढ़ गया। यह चमत्कार टीवी स्टूडियो में नहीं हुआ था। यह हुआ था फाइलों, पैâसलों और आर्थिक अनुशासन से। आज नारंगी का एक नया दौर है। आज हर बात को उत्सव बना देने का दौर है। लेकिन अर्थव्यवस्था तालियों से नहीं चलती। रिजर्व बैंक देश की आपातकालीन ताकत होता है। उसका रिजर्व फंड वह दीवार है, जो संकट के समय देश को गिरने से बचाती है। लेकिन जब सरकारें उसी दीवार की ईंटें निकालकर रोजमर्रा की राजनीति चमकाने लगें, तब सवाल उठेंगे ही। सरकारें रिजर्व बैंक से सरप्लस लेती रही हैं, लेकिन जब आपातकालीन फंड तक हाथ पहुंच जाए तो चिंता होना स्वाभाविक है। क्योंकि देश प्रचार से नहीं, संस्थाओं की मजबूती से चलता है। लोकतंत्र में सवाल पूछना देशद्रोह नहीं होता, बल्कि वही देशभक्ति का सबसे जरूरी रूप होता है। प्रोपेगेंडा थोड़ी देर के लिए तालियां दिला सकता है, लेकिन राष्ट्र निर्माण सत्य, श्रम और विवेक से होता है। झूठ के नीचे जमीन नहीं होती और बिना जमीन के कोई इमारत ज्यादा दिन खड़ी नहीं रहती, ऐसा महसूस होने लगा है। झूठ की बुनियाद पर खड़ी की गई इमारत अब भरभराकर गिरने वाली है।

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