देश के ८०वें स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने भाषण दिए। दोनों ने ही राष्ट्र के नाम संदेश दिया। जंतर-मंतर पर युवाओं के आंदोलन के बाद युवाशक्ति के ज्वालामुखी का खौफ सत्ताधारियों को सताने लगा है। इसीलिए स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर देश को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने कहा, ‘युवाशक्ति ही राष्ट्र की बहुमूल्य संपत्ति है। अब भविष्य में पेपर लीक नहीं होंगे।’ राष्ट्रपति को ८०वें स्वतंत्रता दिवस पर पेपर लीक पर बोलना पड़ा। राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाएं पिछले कुछ वर्षों में एक खेल बनकर रह गई हैं। हर महत्वपूर्ण परीक्षा के पेपर लीक होने से देश की सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली कितनी खोखली हो चुकी है और इससे युवाओं की जिंदगी कैसे तबाह हुई है, यह साफ दिखा। राष्ट्रपति महोदया ने बताया कि सरकार अब सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार करने जा रही है। राष्ट्रपति अपनी खुद की मन की बात नहीं रखतीं, वे सरकार द्वारा लिखकर दिए गए भाषण का वाचन करती हैं। इसलिए एक तरह से राष्ट्रपति का भाषण मोदी की ही ‘मन की बात’ होता है। राष्ट्रपति ने कहा, ‘देश का बहुसंख्यक युवा अब पढ़कर नौकरी के पीछे नहीं भाग रहा, बल्कि ‘नौकरियां’ पैदा करनेवाला उद्यमी बन रहा है। युवाओं ने अपना मजबूत स्टार्ट-अप इकोसिस्टम बनाया है। युवाओं की ऊर्जा, प्रतिभा और जिद भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में गति दे रही है।’ भारत की राष्ट्रपति को विकास में यह गतिशीलता दिख गई, यह अचरज की बात है। अदृश्य या खोई हुई चीजों को देखने की दिव्य शक्ति मौजूदा सत्ताधारियों को प्राप्त हो चुकी है, लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है। स्टार्ट-अप वगैरह का खोखलापन उजागर हो चुका है। बेरोजगार युवाओं की फौज हर साल तैयार हो रही है और उनका असंतोष व अकुलाहट जगह-जगह दिखाई दे रही है। जंतर-मंतर पर जुटे लोग सिर्फ ‘नीट’ के अभ्यर्थी नहीं थे; वे नोटबंदी, कोविड, सरकार की आर्थिक नीतियों और नाकामी की वजह से नौकरियां और
रोजगार गंवानेवाले लाखों युवा
थे। पिछले दस-बारह सालों में इस वर्ग को सरकार ने जो सपने दिखाए, वे पूरे नहीं हुए। इसीलिए जंतर-मंतर पर युवाओं ने जो तमाम नारे लगाए, उनमें से एक था:
‘बाप की चड्डी फटी पड़ी है,
घर में चूल्हा जलता नहीं है
और बच्चे ‘मोदी-मोदी’ चिल्ला रहे हैं…’
बच्चों को धर्मांध और कांवड़िया आदि बनाकर सत्ताधारियों ने हिंदुत्व के छलावे में उलझाए रखा और उन्हें नशेड़ी बनाकर छोड़ दिया, यह देश का हाल है। जो राष्ट्रपति ने कहा, वही प्रधानमंत्री मोदी लाल किले से गरजे। स्वतंत्रता दिवस से पहले भाजपा वालों ने सात-आठ दिनों तक ‘तिरंगा यात्रा’ निकालकर बच्चों को उसमें उलझाए रखा। असल में तिरंगा विकसित भारत का सपना है, स्वतंत्रता और लोकतंत्र का प्रतीक है। मोदी अब लाल किले से २०३६ और २०४७ के सपने दिखाते हैं, लेकिन २०२९ के बाद न मोदी रहेंगे, न सत्ता में बैठे उनके टोल भैरव। मोदी ने २०३६ के ओलिंपिक खेलों के लिए ‘टैलेंट हंट’ अभियान का एलान किया। मोदी को असल में अपनी सरकार और भाजपा में ‘टैलेंट’ खोजने का अभियान चलाना चाहिए। उनके अंदर का टैलेंट किस हद तक गिर चुका है, इसका अहसास अब कदम-कदम पर हो रहा है। राम मंदिर के दानपात्र लूट लिए गए, तो इस पर भाजपा के ‘टैलेंट’ ने कहा, ‘हिंदुओं का पैसा हिंदुओं ने ही लूटा है, इस पर इतना बवाल मचाने की क्या जरूरत है?’ ऐसे टैलेंट वाले हैं, हमारे हुक्मरान। मोदी का भाषण प्रधानमंत्री पद की गरिमा के अनुकूल नहीं था। भाषण में विचार कम और छींटाकशी ज्यादा थी। एक तरफ राष्ट्रपति युवाशक्ति के गुण गाती हैं तो दूसरी तरफ उन्हीं की सरकार के प्रधानमंत्री मोदी युवाओं और बुद्धिजीवियों को
‘दिमागी नक्सल’
करार देते हैं। मोदी बारह सालों में कोई बड़ी छलांग नहीं लगा सके और उसी कीचड़ को रौंदते रहे। देश के आंदोलनकारी युवाओं को मोदी ने ‘दिमागी’ यानी ‘मानसिक नक्सल’ कहा। लोग उन्हें ढूंढकर उनका बहिष्कार करें, प्रधानमंत्री का लाल किले से ऐसा बोलना किसी स्वस्थ मानसिकता की निशानी नहीं है। मोदी ने लाल किले से कहा, ‘भारत के पास जनता का स्पष्ट जनादेश, स्थिर सरकार, सक्षम न्याय प्रणाली और अपना संविधान है।’ मोदी जो बातें बता रहे हैं, यह तमाम वैभव कभी भारत के पास हुआ करता था। पिछले दस-बारह वर्षों में यह वैभव धूमिल हो चुका है। मोदी की तथाकथित स्थिर सरकार रिश्वतखोरी और विधायकों-सांसदों की खरीद-फरोख्त जैसे आधारों पर टिकी है। भाजपा को २०२४ में स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। उनका अपना आंकड़ा २४० था, जो बैसाखियों के सहारे २९२ हुआ। अब उनका आंकड़ा ३२५ तक पहुंच गया। बिना किसी चुनाव के यह संख्या कैसे फूल गई? यह उन्हें लाल किले से बताना चाहिए था। सक्षम न्याय प्रणाली और संविधान को ‘पंगु’ बनाकर, इन दोनों संस्थाओं में खौफ पैदा करके प्रधानमंत्री मोदी ने तिरंगे को साक्षी बनाकर स्थिर सरकार होने का जो दांव फेंका, वह सरासर छलावा था। मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर अपनी पुरानी परंपरा निभाते हुए देश और जनता से झूठ बोला। उनके शासनकाल में देश की शिक्षा व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, चुनाव आयोग और न्याय प्रणाली जैसी संस्थाओं का पूरी तरह से पतन हो चुका है। जंतर-मंतर पर जब युवाओं के असंतोष का विस्फोट हुआ तो मोदी के हाथ-पांव फूल गए। वे गायब हो गए और सीधे लाल किले पर प्रकट हुए। स्वतंत्रता दिवस के भाषण में जुमलों और बयानों की तोपें चलाकर उन्होंने बारह सालों की अपनी परंपरा बरकरार रखी। बेशक, देश का माहौल बता रहा है कि ये तोपें जल्द ही ठंडी पड़ जाएंगी।
