-लेकिन किसी नेता ने अस्पताल के बाहर अपना पोस्टर नहीं लगाया। उस समय देशभक्ति का मतलब कैमरे के सामने छाती ठोकना नहीं था।
देश केवल नारों से नहीं चलता, न कैमरों की चमक से चलता है और न ही आईटी सेल की फैक्ट्री से। देश चलता है पसीने से, त्याग से और उन लोगों की चुप मेहनत से जिनकी तस्वीरें अखबारों के पहले पन्नों पर नहीं छपतीं। आज प्रोपेगेंडा का ऐसा समय है कि आधा सच पूरा झूठ बना दिया जाता है। वीडियो काटे जाते हैं, बयान चिपकाए जाते हैं और इतिहास को मोबाइल की स्क्रीन पर मनचाहा रंग पहनाकर परोसा जाता है। लेकिन इतिहास इतना कमजोर नहीं होता।
१९४७ में देश आजाद हुआ और तुरंत पाकिस्तान ने हमला कर दिया। टूटी हुई अर्थव्यवस्था, सीमित संसाधन और विभाजन का जख्म लिए भारत ने लड़ाई लड़ी, फिर १९६५ का युद्ध आया। उसके बाद १९६२ में चीन से संघर्ष। देश आर्थिक संकट में था, सूखा पड़ा था, खेत बंजर हो रहे थे और विदेशी मुद्रा खत्म हो रही थी। लेकिन तब के नेतृत्व ने जनता को डर बेचने के बजाय संघर्ष का साहस दिया। १९६५-६६ और १९६६-६७ के अकाल ने देश को हिला दिया था। लोग राशन की लाइन में थे, लेकिन तब भी सरकारें वैज्ञानिकों के साथ खड़ी थीं। हरित क्रांति आई। गांवों में बीज पहुंचे, सिंचाई पहुंची, खाद पहुंची। श्वेत क्रांति ने दूध को अर्थव्यवस्था का आधार बना दिया। पोलियो, चेचक और काली खांसी के टीके लगे, लेकिन किसी नेता ने अस्पताल के बाहर अपना पोस्टर नहीं लगाया। उस समय देशभक्ति का मतलब कैमरे के सामने छाती ठोकना नहीं था। देशभक्ति का मतलब था सीमा पर सैनिक, खेत में किसान और प्रयोगशाला में वैज्ञानिक। आज झूठ की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह वर्तमान को ही नहीं, अतीत को भी निगल जाना चाहता है। पर इतिहास का पेट इतना छोटा नहीं होता कि उसमें पूरा सच समा न सके। सत्यमेव जयते…!
