राजन पारकर
-‘डीजल खत्म, इंसानियत खत्म… सत्ता दिल्ली में मस्त!
महाराष्ट्र में आज हालत ऐसी हो गई है कि गरीब आदमी का जीवन अब सरकार की फाइलों से भी सस्ता हो चुका है। एक तरफ हिंगोली में डीजल के अभाव में एंबुलेंस गर्भवती महिला को लेने से इनकार कर देती है और अजन्मा मासूम बच्चा मां की कोख में ही दम तोड़ देता है, तो दूसरी तरफ सत्ता के तीनों शिलेदार दिल्ली की ठंडी हवाओं में राजनीतिक गणित सेंकने में व्यस्त हैं। ऊपर से पेट्रोल, डीजल और अब सीएनजी ने जनता की जेब पर ऐसा हमला बोला है कि आदमी गाड़ी चलाए या घर चलाए, यही समझ नहीं पा रहा!
‘एंबुलेंस में डीजल नहीं…
हिंगोली में जो हुआ, वह सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था की लाश पर पड़ा हुआ सड़ा ताला है। एक गर्भवती महिला अस्पताल जाने के लिए तड़पती रही, मगर एंबुलेंस वालों ने कहा — ‘डीजल नहीं है!’
वाह रे सरकार! जिस राज्य में नेताओं की गाड़ियों के काफिले किलोमीटरों तक धुआं उड़ाते फिरते हैं, वहां प्रसव पीड़ा में तड़पती एक महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए डीजल नहीं बचा? क्या यही ‘विकास’ है? सरकार की योजनाओं के विज्ञापनों में तो करोड़ों के रंगीन सपने दिखते हैं, मगर हकीकत में गरीब की कोख तक सूख चुकी है। अब सवाल यह है कि डीजल खत्म हुआ था या इंसानियत? आज महाराष्ट्र में अस्पताल कम और सरकारी कब्रिस्तान ज्यादा दिखाई देने लगे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि वहां मृत्यु प्रमाणपत्र बाद में मिलता है और लापरवाही पहले!
‘महाराष्ट्र भगवान भरोसे!’
महाराष्ट्र जल रहा है, किसान परेशान है, महंगाई बेलगाम है… मगर राज्य के बड़े नेता दिल्ली में डेरा डालकर बैठे हैं। ऐसा लग रहा है मानो महाराष्ट्र कोई राज्य नहीं, बल्कि दिल्ली दरबार की शाखा कार्यालय बन गया हो।
जनता पूछ रही है- क्या ये दौरा किसानों के लिए है या विधान परिषद की सीटों के सौदेबाजी के लिए? दिल्ली में बैठकों का इतना शौक है तो फिर मंत्रालय को ही इंडिया गेट के पास शिफ्ट कर दीजिए! कम से कम महाराष्ट्र की जनता रोज यह भ्रम तो नहीं पालेगी कि सरकार मुंबई में बैठती है। छत्रपति शिवाजी महाराज के महाराष्ट्र की राजनीति अब ऐसी हो गई है कि नेता दिल्ली में हाजिरी लगाए बिना खुद को अधूरा समझते हैं। जनता के आंसू सूख जाएं तो चलेगा, लेकिन हाईकमान की भौंहें तननी नहीं चाहिए!
‘सीएनजी भी अब आम आदमी की दुश्मन!’
पहले पेट्रोल महंगा हुआ… जनता ने कहा चलो सीएनजी लगवा लेते हैं। अब सीएनजी भी ऐसे भाग रही है जैसे उसे ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतना हो! पिछले पंद्रह दिनों में १२ रुपए की बढ़ोतरी!
वाह रे अर्थव्यवस्था! सरकार कहती है- ‘देश तरक्की कर रहा है।’
जनता पूछ रही है- ‘तरक्की देश कर रहा है या तेल कंपनियों का मुनाफा?’ अब हालत यह है कि आदमी गाड़ी स्टार्ट करने से पहले पेट्रोल पंप का रेट देखता है और फिर अपनी औकात! मुंबई-पुणे की टैक्सी और वैâब का किराया बढ़ेगा, सब्जियां महंगी होंगी, माल ढुलाई महंगी होगी… यानी सरकार ने महंगाई को ऐसा खुला सांड़ छोड़ दिया है जो सीधे जनता की जेब में सींग मार रहा है।
‘जनता रो रही है, सत्ता हंस रही है!’
एक तरफ मां अपनी कोख में बच्चे को खो देती है… दूसरी तरफ नेता दिल्ली में राजनीति का शतरंज खेल रहे हैं… और तीसरी तरफ तेल कंपनियां जनता की जेब पर डाका डाल रही हैं। यह लोकतंत्र नहीं, ‘लूटतंत्र’ का ट्रेलर लगता है। ‘इस देश में अब जनता सिर्फ वोट देने के लिए जिंदा रखी जाती है, बाकी उसके आंसू, उसकी भूख और उसकी मौत-सब सरकारी प्रेस नोट में समा जाते हैं!’
