मुख्यपृष्ठस्तंभविशेष: उजली यादों के मुसाफिर- बशीर बद्र का जाना

विशेष: उजली यादों के मुसाफिर- बशीर बद्र का जाना

विजयशंकर चतुर्वेदी

ईद के मुकद्दस दिन उर्दू गजल के सबसे महबूब और लोकप्रिय शायर डॉ. बशीर बद्र का इस फानी दुनिया से रुख़सत होना एक युग का अंत है। बुजुर्ग कहते हैं कि ईद के दिन जाने वाली रूह अपने साथ दुनिया का गर्दोगुबार नहीं, दुआओं की खुशबू लेकर जाती है। उनके जाने से ऐसा महसूस होता है जैसे उर्दू शायरी की एक पूरी शाम अचानक बुझ गई हो।
बशीर बद्र महज एक शायर नहीं, बल्कि उर्दू जबान का वह तहजीबी किरदार थे, जिसमें नफासत, दर्द और मोहब्बत का अनूठा संगम था। वे उन विरले रचनाकारों में से थे, जिनकी शायरी किताबों से ज्यादा लोगों के दिलों और जबान पर राज करती थी। बदलते समाज और रिश्तों की औपचारिकता पर उनका यह शेर एक जीवंत दस्तावेज है।
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो।
उनकी शायरी की जड़ें मीर की उदासी, गालिब की आत्मचेतना और फिराक की नर्मी से जुड़ती हैं, लेकिन उन्होंने अपनी राह बिल्कुल अलग बनाई। उन्होंने क्लिष्ट शब्दों के बजाय बेहद आसान जबान में बड़ी बातें कहीं। जिंदगी की अनिश्चितता को बयां करता उनका यह कालजयी शेर आज उनकी विदाई पर सबसे सटीक बैठता है,
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।
मुशायरों के मंच पर बशीर बद्र का अंदाज अलहदा था। अपनी शालीनता, ठहराव और संगीतात्मक लय से वे मुशायरा लूट लेते थे। देश ही नहीं, पाकिस्तान, दुबई और ब्रिटेन तक सरहदों को लांघकर उन्हें बेशुमार मोहब्बत मिली।
उनकी जिंदगी सिर्फ शोहरत की नहीं, गहरे संघर्षों की भी कहानी थी। दंगों में उनका घर, बेशकीमती पांडुलिपियां और बरसों की मेहनत जलकर राख हो गई। इस त्रासदी पर चीखने के बजाय उन्होंने पूरी संजीदगी से समाज को आईना दिखाया,
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।
संसद से लेकर चाय की टपरियों तक, प्रेमियों से लेकर तन्हा दिलों तक, बशीर बद्र हर जगह उद्धृत किए गए। आज भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन हमारी सामाजिक संवेदनाओं में हमेशा जीवित रहेंगे। विदा लेते हुए उनका यह शेर हमें एक सांत्वना दे जाता है,
मुसाफिर हैं हम भी मुसाफिर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी।
खुदा उन्हें जन्नतुल-फिरदौस में आला मकाम अता करे। आमीन!
(वरिष्ठ पत्रकार कवि एवं लेखक)

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