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इस्लाम की बात : इब्राहिम समझौता … शांति की नई बिसात या महत्वाकांक्षाओं का चक्रव्यूह

सैयद सलमान मुंबई
पश्चिम एशिया का राजनीतिक भूगोल हमेशा से ही पेचीदा और अप्रत्याशित रहा है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ‘इब्राहिम समझौते’ के दायरे को बढ़ाकर इसमें सऊदी अरब, कतर और ईरान जैसे धुर विरोधी देशों को शामिल करने की वकालत ने नई हलचल पैदा कर दी है। ट्रंप का दावा है कि ईरान के साथ संभावित क्षेत्रीय समझौते के बाद सभी मुस्लिम देशों को इस पर हस्ताक्षर करने चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि विरोधाभासों से भरे इस क्षेत्र में यह योजना महज एक कूटनीतिक कल्पना है या इसके पीछे कोई ठोस धरातल मौजूद है? इस समझौते को ‘इब्राहिम’ (अब्राहम) नाम देने के पीछे एक खास वजह है। यह नाम यहूदी धर्म, इस्लाम और ईसाई धर्म की साझा धार्मिक और ऐतिहासिक जड़ों को ध्यान में रखकर एकजुटता के प्रतीक के रूप में चुना गया है, क्योंकि हजरत इब्राहिम को इन तीनों धर्मों के अनुयायी अपना आदि-पुरुष मानते हैं।
​इब्राहिम समझौते की बुनियाद साल २०२० में ट्रंप के पिछले कार्यकाल के दौरान रखी गई थी, जब संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और बहरीन ने इजरायल को मान्यता देकर दशकों पुरानी दुश्मनी औपचारिक रूप से समाप्त की। बाद में इसमें मोरक्को और सूडान भी शामिल हुए। पारंपरिक रूप से अरब देशों का रुख रहा था कि इजरायल के साथ संबंध तभी सामान्य होंगे, जब फिलिस्तीन विवाद का कोई स्थायी समाधान निकलेगा। हालांकि, यूएई और बहरीन जैसे देशों ने इस पुरानी परिपाटी से अलग हटकर आर्थिक विकास, व्यापार, रक्षा सहयोग और तकनीकी साझेदारी को प्राथमिकता दी। मुस्लिम जगत के एक हिस्से का मानना था कि इजरायल से सीधे जुड़ाव से फिलिस्तीनी हितों के लिए बेहतर मोलभाव किया जा सकता है, जबकि दूसरे बड़े हिस्से ने इसे फिलिस्तीनी संघर्ष के साथ कूटनीतिक विश्वासघात के रूप में देखा।
वैचारिक मतभेद और राजनीतिक मजबूरियां
​ट्रंप का ताजा प्रस्ताव इस समझौते को एक नए और व्यापक क्षितिज पर ले जाने की कोशिश है, जिसे मुस्लिम देश अत्यंत सतर्कता और संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं। ट्रंप की रणनीति का मुख्य सिरा ईरान के इर्द-गिर्द घूमता है। एक तरफ जहां अतीत में इस समझौते का अदृश्य उद्देश्य ईरान के बढ़ते प्रभाव को रोकना और एक इजरायल-अरब सुरक्षा ब्लॉक बनाना था, वहीं अब ट्रंप ईरान को ही इस बड़े शांति ढांचे का हिस्सा बनाने की बात कर रहे हैं। यदि ईरान और अमेरिका के बीच कोई समझौता होता है तो ट्रंप चाहते हैं कि सऊदी अरब और कतर जैसे देश भी तुरंत इजरायल के साथ हाथ मिलाएं। लेकिन मुस्लिम देशों का नजरिया यह है कि अमेरिका अक्सर इस क्षेत्र के आंतरिक संतुलन को अपनी घरेलू राजनीति और चुनावी फायदों के हिसाब से ढालने की कोशिश करता है, जिसमें क्षेत्रीय देशों की सुरक्षा प्राथमिकताओं को नजरअंदाज कर दिया जाता है।
​मुस्लिम जगत के भीतर इस प्रस्ताव को लेकर वैचारिक विभाजन और अपनी-अपनी रणनीतिक मजबूरियां हैं। इस पूरे समीकरण का सबसे महत्वपूर्ण ध्रुव सऊदी अरब है, जिसने बार-बार और स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जब तक एक स्वतंत्र फिलिस्तीन राज्य की स्थापना नहीं होती और पूर्वी यरूशलेम को उसकी राजधानी के रूप में मान्यता नहीं मिलती, वह इजरायल के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। सऊदी अरब खुद को इस्लामी दुनिया का आध्यात्मिक और राजनीतिक अगुआ मानता है, ऐसे में मक्का और मदीना के संरक्षक के रूप में वह फिलिस्तीनी मुद्दे को दरकिनार करने का जोखिम नहीं ले सकता।
नई सियासी बिसात
​दूसरी ओर, ईरान का दृष्टिकोण अमेरिकी प्रतिबंधों की विभीषिका और अपनी संप्रभुता से जुड़ा है। ईरान के लिए अमेरिका के साथ किसी भी समझौते का मतलब इजरायल के अस्तित्व को स्वीकार करना न होकर अपनी अर्थव्यवस्था को बचाना है। गाजा और लेबनान में जारी हालिया संघर्षों के बीच, जहां ईरान समर्थित गुट इजरायल के खिलाफ सीधे युद्ध में हैं, मुस्लिम आवाम के भारी दबाव के कारण ईरान के लिए इजरायल के साथ किसी साझा समझौते पर हस्ताक्षर करना वैचारिक और राजनीतिक रूप से असंभव के करीब है।
वहीं कतर जैसा देश, जो हमास और पश्चिमी देशों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है, अपनी स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति को किसी एक अमेरिकी प्रâेमवर्क के लिए दांव पर नहीं लगाना चाहेगा।
​ट्रंप का यह प्रयास एक ‘कूटनीतिक जुआ’ है जो वॉशिंगटन के चश्मे से तो आकर्षक लग सकता है, लेकिन मुस्लिम देशों के जमीनी यथार्थ से कोसों दूर है। मुस्लिम देश जानते हैं कि कूटनीति सिर्फ आर्थिक लाभ के जुमलों के बजाय जमीन पर मौजूद ऐतिहासिक घावों, धार्मिक संवेदनशीलताओं और न्याय के सवालों को सुलझाने से चलती है। ट्रंप की इस नई सियासी बिसात ने दुनिया को सोचने पर मजबूर तो कर दिया है, लेकिन जब तक फिलिस्तीन के न्यायसंगत अधिकार और मुस्लिम देशों की संप्रभु चिंताओं को इस समझौते के केंद्र में नहीं रखा जाता, तब तक यह योजना पश्चिम एशिया में स्थायी शांति का सूत्र बनने के बजाय महज एक और कूटनीतिक मृगतृष्णा ही साबित होगी।

(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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