संजय राऊत
भारत की सीमा पर स्थित भूटान एक स्वतंत्र देश है, लेकिन भूटान में कदम रखने से लेकर वापस निकलने तक कहीं भी यह महसूस नहीं होता कि हम विदेश में हैं। (चिकित्सा कारणों से) सात दिन भूटान की सैर करने का मौका मिला। वह आनंददायक लगा। इंसानियत खो चुके देश से इंसानियत का जतन करनेवाले देश में आने की भावना प्रबल हो गई। एक बात समझ आई कि भूटान में भारत की तरह ‘जीडीपी’ का खेल नहीं है। वहां ‘जीएनएच’ को महत्व है। (Gross National Happiness) को महत्व है। लोग खुश और संतुष्ट रहें, इसके लिए वहां की सरकार और भूटान के राजा काम करते हैं। १९७० के दशक में भूटान के चौथे राजा जिग्मे सिंग्ये वांगचुक ने जीएनएच (GNH) की संकल्पना रखी। वांगचुक ने कहा, ‘‘सुख को पैसे, संपत्ति, उत्पादन में नहीं तौला जा सकता। Gross National Happiness is more important than Gross domestic product.’’ इतना कहकर वे रुके नहीं, बल्कि २००८ में भूटान का जो संविधान बना, उस संविधान में इस संकल्पना को अधिक स्थान दिया गया। भारत में जातीय आरक्षण से लेकर चुनाव कैसे कराए जाएं, इस पर मार्गदर्शन भरपूर है, लेकिन लोगों को खुश, संतुष्ट रखने के बारे में कुछ भी नहीं है। भूटानी लोगों के चेहरे से खुशी कभी हटती नहीं। एक भारतीय रेस्टोरेंट में खाना खाने गया। वहां सभी कर्मचारी भूटानी थे। दरवाजे पर Closed का बोर्ड लटका था। ‘कल ही हम यहां इसी समय खाना खाए थे। भारतीय पर्यटकों से होटल खचाखच भरा था। आज बंद क्यों?’ ऐसा सवाल मन में आया। पर्याप्त स्टाफ उपलब्ध न होने के कारण आज सेवा नहीं दे पा रहे हैं, ऐसा होटल के कर्मचारियों ने बताया। नीचे उतर आया। गाड़ी में बैठा तो गाइड ने बताया, ‘‘स्टाफ की समस्या नहीं है।’’
‘‘फिर?’’
‘‘सर, वैश्विक युद्ध की स्थिति के कारण सिलेंडर की किल्लत का यह असर है, लेकिन ‘किल्लत’ है ऐसा बताने से देश में ‘पैनिक’ की स्थिति न हो,’’ गाइड।
भारत में ‘किल्लत’ के मुद्दे पर सरकार-विपक्ष में घमासान मचा है। लोगों की कतारें लगी हैं। जनता के चेहरे पर का तनाव अगले विद्रोह की चिंता दिखाता है। भूटान में ‘कमी’ है, लेकिन लोगों ने उस पर बोलना टाल दिया है, यह महत्वपूर्ण है।
भारत की जिम्मेदारी
भूटान भारत का मित्र है। भूटान की रक्षा की जिम्मेदारी भारत ने ली थी, जो आज भी कायम है। भूटान की जनता इसके लिए पंडित नेहरू का आज भी सम्मान करती है। नेहरू के नाम पर भारत-भूटान मैत्री की कई संस्थाएं ‘थिम्पू’ और ‘पारो’ में खड़ी हैं। तिब्बत और भूटान का बौद्ध धर्म एक ही है। वङ्कायान बौद्ध धर्म भूटान और तिब्बत का मुख्य धर्म है। तिब्बत से यह धर्म भूटान की भूमि पर आया, लेकिन भूटान और तिब्बत की सीमा आज बंद है। क्योंकि तिब्बत पर चीन का नियंत्रण है। चीन और भूटान के बीच फिलहाल कोई राजनयिक संबंध नहीं हैं। सुरक्षा के लिए भूटान पूरी तरह भारत पर निर्भर है। भूटान में पुलिस स्टेशन हैं, लेकिन ज्यादा अपराध न होने के कारण पुलिस के पास काम नहीं है। मैं खुद ‘पारो’ के जिला न्यायालय में गया। कोर्ट में हमारी तरह ‘सत्यमेव जयते’ का झूठा बोर्ड नहीं रंगा हुआ है। वहां के कोर्ट भी मंदिर की रचना जैसे ही हैं और कोर्ट पर लिखा है, Equal Justice Court (समान न्याय का न्यायालय)। कोर्ट में भी ज्यादा काम नहीं दिखा। क्योंकि यहां के लोग धार्मिक, आध्यात्मिक और ईमानदार हैं। ये सभी गुण उनकी धर्म शिक्षाओं में हैं। पुणे के पर्यटकों का एक समूह थिम्पू में मिला। लोगों की ईमानदारी पर उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया। ये लोग इतने ईमानदार कैसे? मैंने कहा, ‘‘यहां का राजा ईमानदार है। इसलिए प्रजा भी ईमानदार हुई। जनता को उसकी लायकी के अनुसार राजा मिलता है, यह चाणक्य सूत्र भूटान में सच साबित हुआ।’’ भूटानी लोगों की ईमानदारी की ख्याति दुनियाभर में है। शांति, सौजन्य, नैतिकता उनके जीवन का सूत्र है। वङ्कायान बौद्ध धर्म का प्रभाव यहां के अधिकांश लोगों पर है। इस धर्म में सत्य, करुणा, नैतिकता और अहिंसा को बहुत महत्व है। ईमानदारी केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि भूटान के दैनिक जीवन का वह सूत्र और आध्यात्मिक प्रगति का हिस्सा है। हिंदू धर्म में भी यह सब है। लेकिन राजा ने ईमानदारी छोड़ दी। तब भी प्रजा उसी राजा को पूज रही है। हिंदुओं के मौजूदा ठेकेदारों को भूटान में जाकर धर्मराज्य और धर्मध्वजा क्या होती है, इसका अध्ययन करना चाहिए। हमसे कोई गलती न हो, अपराध न हो, इसके लिए भूटानी लोग लगातार हाथ में माला लेकर मंत्रजाप करते दिखते हैं। बाजार में, सड़क पर चलते हुए भी हर जगह उनका यह मंत्रपाठ चलता रहता है। यह सब उन्हें आध्यात्मिक और सकारात्मक ऊर्जा देता है। ये लोग अपनी प्रतिष्ठा का ख्याल रखते हैं, शांत रहते हैं। एक-दूसरे की मदद करते हैं। mind your own business के सिद्धांत पर चलते हैं। एक पर्यटक ने बताया, ‘‘मैं हर साल भूटान आता हूं।’’ उसने आगे कहा, ‘‘यहां मन शांत रहता है। विश्वास, ईमानदारी का मूल्य समझ आता है। भारत में अब भ्रष्टाचार का स्तर कहां तक पहुंच गया है, यह यहां के ‘गुड गवर्नेंस’ का अनुभव लेने पर समझ आता है।’’ यहां भ्रष्टाचार लगभग है ही नहीं। दुनिया में यह एक छोटा-सा देश है। वहां भ्रष्टाचार नहीं है, ऐसा जब हमारे भारत के लोग कहते हैं तब भूटान पर गर्व होता है।
औषधीय वनस्पतियों का जंगल
‘मेनजाँग ग्यालरवब’ यह भूटान की पुरानी पहचान है। वह आज भी है। मेनजाँग ग्यालरवब का मतलब है औषधीय वनस्पतियों का देश। यहां दवाइयों (Pharmaceutical) के उद्योग नहीं हैं, बल्कि ६०० से ज्यादा वन-औषधियों का भंडार यहां के पहाड़ों और जंगलों में है। यार्सा गुनबुशी (Caterpillar Fungus) जैसी दुर्लभ औषधीय वनस्पति ६,००० मीटर की ऊंचाई पर मिलती है। दुनिया की सबसे महंगी वन-औषधि के रूप में उसे मान्यता है। यह वनस्पति कैंसर से लेकर अस्थमा तक सभी बीमारियों को नियंत्रण में लाती है, ऐसा कई लोगों का विश्वास है। भारत के कई नेता, अभिनेता, अभिनेत्रियां इस वनस्पति के इलाज के लिए साल में कम से कम दो बार तो भूटान आते ही हैं। ‘थिम्पू’ में Institute of Traditional Medicine Services मे स्थापित है। यहां भूटान की सभी पारंपरिक दवाइयां और उपचार पद्धतियां उपलब्ध हैं। भारत और यूरोपीय देशों से कई लोग यहां आते हैं।
प्रशिक्षित डॉक्टर इलाज करते हैं और वनस्पतियों पर शोध करके नई दवाइयों का निर्माण करते हैं। सैकड़ों वनस्पतियों और उनकी खुशबू से यह इंस्टीट्यूट इंसान को प्रसन्न कर देता है। भूटान औषधीय वनस्पतियों की जमीन (Land of Medicinal Herbs) है और इन सबका एक धार्मिक आधार जरूर है। यहां अभी तक कोई व्यावसायिक रामदेव बाबा पैदा नहीं हुआ। इसलिए औषधीय वनस्पतियों की पवित्रता बनी हुई है।
स्वच्छ कल-कल बहती नदियां
भूटान आनंद का देश है। प्राकृतिक सुंदरता का यह खजाना है। ६० प्रतिशत हरियाली है। स्वच्छ नदियां कल-कल बहती दिखती हैं। नदियां इतनी साफ और पारदर्शी हैं कि कई जगहों पर नदी का तल दिखता है। भारत में नदियों की पूजा होती है। कुंभ पर्व होता है। नदियों को माता कहा जाता है, लेकिन नदियां बेहद प्रदूषित हैं। भूटान में नदियों की पूजा नहीं होती। नदियों के उत्सव, धर्मविधि नहीं हैं, लेकिन मानो हिमालय से पवित्र गंगा कल-कल करती हुई भूटान आ गई हो, ऐसा उसे देखकर लगता है। इन नदियों की तरह ही भूटान की सरकार और राजनीति भी स्वच्छ है। भूटान के प्रधानमंत्री और मंत्रियों की तस्वीरें, बैनर्स होर्डिंग्स मुझे कहीं नहीं दिखे, लेकिन मौजूदा राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक की पत्नी संग तस्वीरें हर जगह दिखती हैं। राजा के प्रति जनता में आदर और प्रेम है। २००८ में भूटान में राजशाही के बजाय Constitutional Monarchy यानी संवैधानिक राजशाही आई। राजा ने भूटान को संसदीय लोकतंत्र दिया, लेकिन राजा पूरी तरह संवैधानिक प्रमुख यानी Head of State है। भूटान का मुख्य धर्म ‘बौद्ध’ है, लेकिन इसे ‘बौद्ध गणराज्य’ राजा ने बनने नहीं दिया, यह महत्वपूर्ण है। बौद्ध मठ और उनके प्रमुखों का राज्य शासन में हस्तक्षेप नहीं है। वे धर्म, अध्यात्म और अन्य धार्मिक कार्य करते रहें। धर्म और शासन व्यवस्था में यहां गड़बड़ी नहीं होने देते। इसलिए शासन और धर्म अपने-अपने रास्ते पर आगे बढ़ते हैं। कई मठों में परंपरा से ‘तांत्रिक’ पूजा होती है। इसमें जादू-टोना वगैरह शक्तियों का समावेश है। ये सब तिब्बत से भूटान आए, लेकिन भूटानी जनता अब इस जादू-टोने के मार्ग पर नहीं जाती। फिर यहां यह जादू-टोने का इलाज कराने वाले कौन हैं? ‘‘आपके महाराष्ट्र के कई नेता चार्टर विमान से विशेष रूप से इसके लिए यहां आते हैं। वह एक अलग विषय है,” ऐसी जानकारी एक मठाधीश ने दी।
फिर भी भूटान सुंदर, स्वच्छ, ईमानदार और खुशहाल देश है। सैकड़ों औषधीय वनस्पतियों का यह देश हृदय से भारत के करीब है!
सीमाएं सिर्फ नाम की ही हैं।
भारत और भूटान सिर्फ ‘पड़ोसी’ नहीं हैं। हिमालय से जुड़ी ये दो आत्माएं एक-दूसरे पर विश्वास रखकर आगे बढ़ रही हैं। भूटान पुण्य कमाकर जीने वालों का देश है। भारत में फिलहाल उसकी भी कमी है।
लेकिन भूटान हमारी गंगा की तरह पाप धोने की जगह नहीं है। यहां की नदियों में पुण्य बहता है। यहां के जंगल में, पेड़-पौधों में पुण्य और सच्चाई का वास है।
हर भारतीय को ‘पुण्य’ क्या है, इसका अनुभव एक बार जरूर करना चाहिए। भूटान एक देश नहीं, स्वच्छ मन का अनुभव है।
