डॉ. मंगलेश्वर त्रिपाठी
केंद्र में १० साल से बीजेपी की सरकार है। देश के १८ से ज्यादा राज्यों में बीजेपी या उसके गठबंधन का शासन है। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभा स्पीकर और सभी राज्यपाल बीजेपी के हैं। RSS के लाखों स्वयंसेवक, हजारों शाखाएं और दर्जनों अनुषांगिक संगठन पूरे देश में फैले हैं।
इसके बावजूद हर चुनाव से पहले RSS-BJP का एक ही राग सुनाई देता है— ‘हिंदुत्व खतरे में है।’ यह कोई हकीकत नहीं, बल्कि डर की खेती है। सत्ता हथियाने और उसे बनाए रखने का सबसे सस्ता हथियार है।
१. सत्ता में हो, तो खतरा कैसा?
अगर वाकई हिंदुत्व खतरे में है, तो १२ साल से केंद्र और बहुमत वाले राज्यों में बैठी बीजेपी ने किया क्या? RTE कानून आज भी वही है, प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट नहीं बदला, वक्फ बोर्ड के अधिकार वैसे के वैसे हैं। मंदिर आज भी सरकार के कब्जे में हैं। यानी खतरा दूर करने के लिए कुछ नहीं किया, सिर्फ खतरे का ढोल पीटा। क्योंकि खतरा खत्म हो गया, तो वोट किस नाम पर मांगेंगे?
२. आंकड़ों का झूठ
‘९ राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक’ का शोर मचाया जाता है। हकीकत यह है कि उन ९ में से ६ पूर्वोत्तर के छोटे राज्य हैं, जहां ईसाई बहुसंख्यक आजादी के पहले से हैं। पंजाब में सिख बहुसंख्यक १९४७ से हैं। जम्मू-कश्मीर का विशेष इतिहास है। बचे लद्दाख और मिजोरम, जिनकी कुल आबादी १५ लाख भी नहीं है। १४० करोड़ के देश में इसे ‘हिंदुत्व पर खतरा’ बताना सफेद झूठ है।
३. डेमोग्राफी का डर
‘मुस्लिम आबादी बढ़ रही है’ — यह आधा सच है। १९५१ में मुस्लिम ९.८ प्रतिशत थे, २०११ में १४.२ज्ञ्। ६० साल में ४.४ प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। इसी रफ्तार से अगले १०० साल में भी हिंदू बहुसंख्यक ही रहेंगे। पर RSS-BJP इसे ‘२०४० तक हिंदू अल्पसंख्यक’ बताकर दहशत पैâलाती है।
४. असली मुद्दों से भागना
२०२५ में साइबर ठगी ११७ करोड़ की हुई। किसान खाद के लिए लाइन में खड़ा है। नौजवान बेरोजगार घूम रहा है। महंगाई, भ्रष्टाचार और थानों का हफ्ता सिस्टम जस का तस है। इन सवालों का जवाब देने के बजाय ‘लव-जिहाद’, ‘धर्मांतरण’ और ‘मंदिर खतरे में’ का शोर मचाओ। जनता डर जाएगी, तो रोटी और रोजगार भूल जाएगी।
निष्कर्ष
‘हिंदुत्व खतरे में’ RSS-BJP की मनगढ़ंत कहानी है। खतरा हिंदुत्व को नहीं, बीजेपी की सत्ता को है। इसलिए हर चुनाव से पहले नया डर पैदा किया जाता है। जब सरकार, संगठन, पैसा और मीडिया सब तुम्हारा है, फिर भी खतरा है, तो या तो तुम नाकाबिल हो, या झूठे हो। देश को डर नहीं, रोजगार चाहिए। नफरत नहीं, स्कूल-अस्पताल चाहिए। पर डर बेचने वालों की दुकान तभी चलती है, जब जनता आंख बंद कर ले। सवाल है — कब तक?
