रोहित माहेश्वरी लखनऊ
उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में निर्माणाधीन पुल का गिरना केवल एक हादसा नहीं, बल्कि व्यवस्था की गंभीर लापरवाही का प्रतीक बन गया है। बेतवा नदी पर बन रहे पुल का एक हिस्सा ढहने से छह मजदूरों की दर्दनाक मौत हो गई। राज्य सरकार ने मृतकों के परिजनों को पांच-पांच लाख रुपए मुआवजा देने की घोषणा की है, लेकिन इस घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है-क्या छह मजदूरों की जान की कीमत महज पांच लाख रुपए है? देश और प्रदेश में विकास परियोजनाओं के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जब निर्माण स्थलों पर काम करने वाले मजदूरों की सुरक्षा की बात आती है तो अक्सर गंभीर खामियां सामने आ जाती हैं। यदि सुरक्षा मानकों का पालन पूरी सख्ती से किया गया होता, निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की नियमित निगरानी होती और संभावित जोखिमों को समय रहते पहचाना गया होता, तो शायद छह परिवार आज अपने कमाने वाले सदस्यों को न खोते। घटना के बाद मुआवजे की घोषणा करना सरकार का दायित्व है, लेकिन इससे जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती। असली जरूरत यह पता लगाने की है कि हादसे के पीछे किसकी लापरवाही थी और उसके खिलाफ क्या कार्रवाई होगी।
अहिल्याबाई के सम्मान पर चोट या प्रशासनिक चूक?
हाथरस जनपद के थाना हाथरस जंक्शन क्षेत्र स्थित पूरा चौकी के बेरगांव में माता अहिल्याबाई होल्कर की जयंती के अवसर पर लगाए गए सम्मान बोर्ड को एक पुलिसकर्मी द्वारा कथित रूप से लात मारकर गिराए जाने का मामला राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बन गया है। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे नारी सम्मान, भारतीय विरासत और करोड़ों लोगों की आस्था का अपमान बताया है। माता अहिल्याबाई होल्कर केवल एक ऐतिहासिक शासक नहीं, बल्कि सुशासन, न्याय और जनसेवा की प्रतीक मानी जाती हैं। ऐसे में उनके सम्मान में लगाए गए बोर्ड के साथ किसी भी प्रकार की अभद्रता स्वाभाविक रूप से लोगों की भावनाओं को आहत करती है। हालांकि, घटना की वास्तविक परिस्थितियां क्या थीं, यह जांच का विषय है, लेकिन वायरल वीडियो ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
