मुख्यपृष्ठस्तंभफलसफा: बेटियों को चाहिए विश्वास की उड़ान

फलसफा: बेटियों को चाहिए विश्वास की उड़ान

सना खान

नंदिनी बचपन से ही महत्वाकांक्षी और होनहार लड़की थी। जब दूसरे बच्चे खेलकूद में व्यस्त रहते थे, तब वह अपने भविष्य के बड़े-बड़े सपने संजोती थी। उसके पिता अक्सर कहते थे कि एक दिन वह परिवार का नाम रोशन करेगी। नंदिनी ने भी उनकी उम्मीदों पर खरा उतरते हुए पढ़ाई में शानदार प्रदर्शन किया, कॉलेज में गोल्ड मेडल हासिल किया और एक प्रतिष्ठित कंपनी में नौकरी पा ली। उसकी सफलता पर पूरा परिवार गर्व महसूस करता था।
कुछ समय बाद नंदिनी को विदेश में उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति मिली। यह उसके जीवन का सबसे बड़ा अवसर था। लेकिन जब उसने यह खबर अपने पिता को दी, तो उनकी खुशी चिंता में बदल गई। उन्हें डर था कि बेटी का अकेले विदेश में रहना सुरक्षित नहीं होगा। नंदिनी ने सवाल किया, ‘क्या सपनों का भी कोई लिंग होता है, पापा?’ यह सवाल केवल विदेश जाने का नहीं, बल्कि समान अधिकार और विश्वास का था।
धीरे-धीरे घर में उसकी पढ़ाई की जगह शादी की चर्चा होने लगी। रिश्तेदार समझाने लगे कि लड़कियों का असली घर ससुराल होता है। तब नंदिनी ने अपने पिता से पूछा, ‘क्या आपने कभी भैया से पूछा कि उसका असली घर कौन-सा है?’ यह सुनकर पिता सोच में पड़ गए। कई दिनों के विचार के बाद उन्होंने नंदिनी को छात्रवृत्ति का पत्र लौटाते हुए कहा, ‘जाओ, अपने सपने पूरे करो। अगर हम तुम्हें उड़ने से रोक देंगे, तो तुम्हें पंख देने का दावा भी नहीं कर सकते।’
यह कहानी बताती है कि बेटियों को केवल शिक्षा और अवसर ही नहीं, बल्कि विश्वास की भी जरूरत होती है। उन्हें सपने देखने के साथ-साथ उन्हें पूरा करने की स्वतंत्रता भी मिलनी चाहिए। क्योंकि पंखों का उद्देश्य केवल सुंदर दिखना नहीं, बल्कि उड़ना होता है। अक्सर बेटियों की उड़ान को आसमान नहीं, बल्कि समाज का डर रोकता है।
पंख भी दिए, हौसले भी दिए, फिर डर क्यों दे दिया,
सपनों का रास्ता दिखाकर ये सफर क्यों दे दिया।
शिकायत आसमान से नहीं, उन सोचों से है,
जिन्होंने बेटी को उड़ने से पहले ही सरहदों का घर दे दिया।

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