के.पी. मलिक
भारत की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था लंबे समय से भारतीय किसानों, सरकारी खरीद प्रणाली और भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के मजबूत नेटवर्क पर आधारित रही है। यही वह व्यवस्था है जिसने अकाल, महामारी और आर्थिक संकट के दौर में करोड़ों लोगों तक अनाज पहुंचाने का काम किया। लेकिन हाल के वर्षों में एफसीआई की भंडारण और लॉजिस्टिक्स व्यवस्था में निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
एफसीआई बनाम निजी खिलाड़ी
हाल में सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, एफसीआई की वेयरहाउसिंग और लॉजिस्टिक्स परियोजनाओं के बड़े हिस्से पर अडानी समूह और उसकी सहयोगी कंपनियों का दबदबा स्थापित हो गया है। आरोप यह है कि टेंडर शर्तों में ऐसे बदलाव किए गए, जिनसे पहले मौजूद ‘एकाधिकार-विरोधी’ सुरक्षा प्रावधान कमजोर पड़ गए और परिणामस्वरूप कुछ चुनिंदा कंपनियों को बड़ी संख्या में ठेके मिल गए। रिपोर्टों के अनुसार, लगभग २० हजार करोड़ रुपए की परियोजनाओं में से १६,५०० करोड़ रुपए से अधिक के अनुबंध अडानी समूह और लीप इंडिया से जुड़ी कंपनियों को मिले। यह सवाल केवल किसी एक कारोबारी समूह का नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या देश की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था धीरे-धीरे कुछ बड़े निजी समूहों पर निर्भर होती जा रही है? यदि ऐसा है तो इसके आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक परिणाम क्या होंगे?
जाहिर है कि एफसीआई की स्थापना का मूल उद्देश्य किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद, सुरक्षित भंडारण और जरूरतमंद आबादी तक खाद्यान्न पहुंचाना था। इस पूरी व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा और विविधता महत्वपूर्ण तत्व रहे हैं। यदि भंडारण, परिवहन और वितरण का बड़ा हिस्सा कुछ सीमित कंपनियों के हाथों में केंद्रित हो जाता है तो भविष्य में सरकार की सौदेबाजी क्षमता कम हो सकती है और खाद्य आपूर्ति शृंखला अधिक संवेदनशील बन सकती है। इस बहस को और गंभीर इसलिए भी माना जा रहा है, क्योंकि यह ऐसे समय में सामने आई है जब देश का कृषि क्षेत्र जलवायु संकट की मार झेल रहा है। वर्ष २०२६ के दौरान कई राज्यों में असामान्य मौसम देखने को मिला है। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के अनेक हिस्सों में ओलावृष्टि, तेज आंधी, बेमौसम बारिश और हीटवेव ने फसलों को नुकसान पहुंचाया है। गेहूं, दलहन, तिलहन, सब्जियों और फलों की पैदावार प्रभावित होने की खबरें लगातार सामने आती रही हैं।
चिंता का विषय
भारत के मौसम विज्ञान विभाग और कृषि विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी दे रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम की अनिश्चितता बढ़ रही है। कभी अचानक वर्षा, कभी सूखा, कभी अत्यधिक गर्मी और कभी ओलावृष्टि किसानों के लिए नई सामान्य स्थिति बनती जा रही है। ऐसे में उत्पादन लागत बढ़ती है, जबकि उत्पादकता पर दबाव पड़ता है। हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि देश में व्यापक खाद्यान्न संकट या अकाल जैसी स्थिति बनने जा रही है। भारत के पास अभी भी पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद हैं और एफसीआई के गोदामों में करोड़ों टन अनाज सुरक्षित रखा जाता है। लेकिन चिंता का विषय यह है कि यदि लगातार दो या तीन मौसम चक्रों में उत्पादन प्रभावित होता है तो बफर स्टॉक पर दबाव बढ़ सकता है।
जानकारों का मानना है कि खाद्यान्न की पूर्ण कमी से पहले महंगाई का असर दिखाई देता है। यदि उत्पादन घटता है और आपूर्ति शृंखला कुछ बड़े निजी खिलाड़ियों पर निर्भर हो जाती है तो कीमतों में तेजी आने की संभावना बढ़ सकती है। इसका सबसे अधिक प्रभाव गरीब और निम्न मध्यम वर्ग पर पड़ेगा, जिनकी आय का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च होता है। यहीं पर एफसीआई की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि देश को भविष्य के खाद्य संकटों से बचाना है तो केवल गोदाम बनाना पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यक है कि खरीद प्रणाली पारदर्शी हो, भंडारण व्यवस्था प्रतिस्पर्धी हो, किसानों को समय पर भुगतान मिले और खाद्यान्न वितरण पर सार्वजनिक निगरानी बनी रहे।
जवाबदेही किसकी?
सरकार का तर्क है कि निजी निवेश से आधुनिक गोदाम, बेहतर लॉजिस्टिक्स और कम बर्बादी सुनिश्चित होगी। यह तर्क पूरी तरह गलत नहीं है। भारत में हर वर्ष बड़ी मात्रा में खाद्यान्न खराब हो जाता है और आधुनिक भंडारण क्षमता की जरूरत वास्तविक है। लेकिन जब किसी एक या कुछ कंपनियों का अत्यधिक प्रभुत्व बनने लगे तो पारदर्शिता और जवाबदेही के सवाल उठना स्वाभाविक है। भारत की खाद्य सुरक्षा केवल अनाज के उत्पादन का प्रश्न नहीं है। यह किसानों की आय, सरकारी खरीद, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, भंडारण ढांचे और बाजार की प्रतिस्पर्धा से जुड़ा हुआ मुद्दा है। यदि इन सभी कड़ियों में संतुलन बना रहता है तो देश किसी भी संकट का सामना कर सकता है। लेकिन यदि उत्पादन घटे और भंडारण तथा वितरण का नियंत्रण कुछ हाथों में सिमट जाए तो जोखिम बढ़ जाता है।
बहरहाल, आज आवश्यकता राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर गंभीर सार्वजनिक बहस की है। देश को यह जानने का अधिकार है कि एफसीआई के टेंडरों में क्या बदलाव किए गए, उनके पीछे क्या तर्क थे और क्या पर्याप्त प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित की गई थी। साथ ही सरकार को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि जलवायु परिवर्तन से प्रभावित कृषि उत्पादन और संभावित खाद्य महंगाई से निपटने की उसकी दीर्घकालिक रणनीति क्या है। खाद्य सुरक्षा किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता का आधार होती है। इसलिए एफसीआई, किसानों और देश के खाद्यान्न भंडार से जुड़े हर पैâसले को केवल कारोबारी दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित और सार्वजनिक जवाबदेही के नजरिए से देखा जाना चाहिए। आने वाले वर्षों में यही भारत की सबसे बड़ी परीक्षा भी होगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, आलोचक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)
