-७५७ स्कूलों पर ताला लगाने की थी तैयारी सरकार की कार्रवाई पर लगी रोक
सामना संवाददाता / मुंबई
पश्चिमी महाराष्ट्र के ७५७ सहायता प्राप्त और गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों को बंद करने की राज्य सरकार की तैयारी पर मुंबई हाई कोर्ट ने बड़ा झटका दिया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि किसी भी शैक्षणिक संस्था को बिना सुनवाई का अवसर दिए बंद करने की कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। कोर्ट के इस पैâसले से हजारों विद्यार्थियों, शिक्षकों और कर्मचारियों को तत्काल राहत मिली है।
जस्टिस माधव जे. जामदार और जस्टिस प्रवीण एस. पाटील की खंडपीठ ने अप्रैल में जारी दो सरकारी प्रस्तावों पर अंतरिम रोक लगाते हुए सरकार को ४३३ प्राथमिक और ३२४ माध्यमिक स्कूलों के खिलाफ किसी भी प्रकार की कठोर कार्रवाई करने से मना कर दिया। इन स्कूलों को कथित रूप से कमजोर शैक्षणिक प्रदर्शन के आधार पर अनुदान प्राप्त करने के लिए अयोग्य घोषित किया गया था।
एक आदेश और ७५७ स्कूल संकट में!
राज्य सरकार ने १ और २ अप्रैल को जारी प्रस्तावों के माध्यम से सैकड़ों स्कूलों को या तो स्वयं वित्तपोषित मॉडल अपनाने या फिर मान्यता खोने की चेतावनी दी थी। यदि निर्धारित समय सीमा तक निर्देशों का पालन नहीं किया जाता, तो स्कूलों की मान्यता रद्द होने का खतरा था, जिससे उनके बंद होने की स्थिति पैदा हो सकती थी। इस निर्णय के खिलाफ स्कूल प्रबंधन अदालत पहुंचे और दावा किया कि कई संस्थाएं दशकों से संचालित हो रही हैं।
तथा हजारों विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान कर रही हैं। कई स्कूल पहले से ही अनुदान के लिए पात्र पाए जा चुके थे, जबकि कुछ को आंशिक वेतन और गैर-वेतन अनुदान भी मिल रहा था।
सरकार को झटका, स्कूलों को बड़ी राहत
हाई कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद फिलहाल ७५७ स्कूलों को बंद होने से राहत मिल गई है। अदालत ने सरकार को किसी भी प्रकार की जबरदस्ती या दंडात्मक कार्रवाई से दूर रहने का निर्देश दिया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई और अंतिम फैसले पर हजारों विद्यार्थियों, शिक्षकों और अभिभावकों की नजरें टिकी हैं।
कोर्ट ने पूछा- बिना सुनवाई कैसे लिया इतना बड़ा फैसला?
सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकार की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि प्रत्येक संस्था को अपना पक्ष रखने का अवसर देना आवश्यक था। बिना नोटिस और बिना व्यक्तिगत सुनवाई के इतने बड़े पैमाने पर कार्रवाई करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन स्कूलों को राज्य सरकार और शिक्षा विभाग से विधिवत मान्यता मिली हुई है, उनकी मान्यता समाप्त करने के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। केवल सरकारी प्रस्ताव के आधार पर उस प्रक्रिया को दरकिनार नहीं किया जा सकता।
