सुबह हुई, शाम हुई,
फिर रात ने डेरा डाला।
था इंतजार, पर ना
उनकी कोई खबर आई।
हम तो मासूम थे,
पर था यकीन ये मुझको,
कभी ना होंगे वो
मेरे, मुझसे हरजाई।
हंसू या रोऊं, या मैं
खुद पे इत्मिनान रखूं,
मेरे जज्बातों की
या रब, करेगा सुनवाई।
छोड़ उम्मीद का दामन,
पकड़ तू राह नई,
बात पूरन की सुन,
है साथ तेरे तन्हाई।
पूरन ठाकुर ‘जबलपुरी’ / कल्याण ईस्ट
