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यूपी में किस कानून का राज है?

-दावों और घटनाओं के बीच फंसी कानून-व्यवस्था

उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार बार-बार यह दावा करती रही है कि वर्ष २०१७ के बाद प्रदेश की तस्वीर बदल गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहते हैं कि यूपी में पहली बार कानून-व्यवस्था चुनाव का बड़ा मुद्दा बनी और इसी मुद्दे पर जनता ने सरकार को दोबारा सत्ता में लौटाया। उनका दावा है कि अराजक, दंगाग्रस्त और कर्फ्यूग्रस्त प्रदेश को ‘सेफ यूपी’ में बदल दिया गया। लेकिन जमीन पर लगातार सामने आ रही घटनाएं इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
आगरा जिले के बाह क्षेत्र में सोमवार रात पूर्व प्रधान अवनीश यादव की गोली मारकर हत्या कर दी गई। उनके भाई उपेंद्र यादव भी हमले में घायल हुए। दोनों कोर्ट में गवाही देकर लौट रहे थे, तभी आगरा-इटावा स्टेट हाईवे पर बदमाशों ने उन्हें निशाना बनाया। पुलिस इसे पुरानी राजनीतिक और चुनावी रंजिश से जोड़कर देख रही है। सवाल यह है कि जब गवाह अदालत से लौटते समय ही सुरक्षित नहीं हैं, तो आम आदमी कानून पर कितना भरोसा करे?
इसी बीच पीलीभीत का मामला पुलिस की छवि पर धब्बा लगाता है। बीसलपुर कोतवाली में तैनात तीन हेड कांस्टेबल एक आरोपी के साथ जन्मदिन मनाते पाए गए। वीडियो वायरल हुआ तो तीनों को निलंबित कर दिया गया। यह घटना बताती है कि अपराधी और कानून के रखवालों के बीच दूरी कितनी बची है।
मुजफ्फरनगर में भाजपा नेता और पूर्व मंत्री के बेटे आर्यमान पर लड़की और उसकी मां से अभद्रता और छेड़छाड़ जैसे आरोप लगे, लेकिन पुलिस पर कमजोर धाराएं लगाने का आरोप लगा। कुछ ही घंटों में शांतिभंग की धारा में पेशी और जमानत ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या कानून सत्ता से जुड़े लोगों के लिए नरम और आम आदमी के लिए सख्त हो जाता है?
फतेहपुर में एक चाय होटल संचालक के यहां सपा प्रमुख अखिलेश यादव के चाय पीने के बाद खाद्य सुरक्षा विभाग ने मिलावट की आशंका में नमूना भर लिया। होटल संचालक ने इसे दबाव की कार्रवाई बताया। ऐसी घटनाएं विपक्षी राजनीति और प्रशासनिक निष्पक्षता पर सवाल खड़े करती हैं।
गोरखपुर से सांसद रवि किशन का यह बयान भी चर्चा में रहा कि वे पांच बार सांसद बन जाएं, फिर भी हर व्यक्ति की समस्या नहीं सुलझा सकते। यह बयान जनता की अपेक्षा और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही के बीच की दूरी दिखाता है।
मुजफ्फरनगर के चरथावल थाने से जुड़ा ऑडियो कांड पुलिस तंत्र की साख पर बड़ा सवाल है। हिस्ट्रीशीटर महिला और सिपाही की बातचीत में नाम हटवाने के लिए कथित तौर पर दो लाख ८५ हजार रुपए देने की बात सामने आई। इसके बाद एसओ और दो सिपाही निलंबित हुए, लेकिन सवाल निलंबन से बड़ा है-थानों में न्याय बिकता है या मिलता है?
सोनभद्र में छह महीने से गायब युवती ने फोन पर मां से कहा, ‘मम्मी, डर लग रहा है, बचा लो।’ मां पहले भी पुलिस से गुहार लगा चुकी थी, लेकिन बेटी का पता नहीं चला। यह मामला पुलिस की संवेदनहीनता और लापरवाही की भयावह मिसाल बन गया।
गाजीपुर के नोनहरा थाने में पुलिस द्वारा कथित लाठीचार्ज में घायल दिव्यांग सीताराम उर्फ जोखू उपाध्याय की मौत ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल खड़े किए। मृतक भाजपा कार्यकर्ता बताए गए, यानी अब सत्ता पक्ष के कार्यकर्ता भी कथित पुलिसिया ज्यादती से सुरक्षित नहीं हैं।
लखनऊ के एसकेडी अस्पताल पर आरोप लगा कि मरीज की मौत के बाद शव को सरकारी अस्पताल में छोड़कर भाग निकले। यह कानून-व्यवस्था ही नहीं, चिकित्सा व्यवस्था की जवाबदेही का भी सवाल है।
यमुनापार के मेजा में दिनदहाड़े स्कॉर्पियो सवार बदमाशों ने इंटर की छात्रा का अपहरण कर लिया। बाद में पुलिस ने छात्रा को बरामद कर लिया और मामला प्रेम प्रसंग बताया, लेकिन दिनदहाड़े अपहरण जैसी घटना ने भय का माहौल जरूर बनाया।
कलवारी थाना क्षेत्र में दुष्कर्म की प्राथमिकी दर्ज कराने वाली नाबालिग छात्रा की घर में घुसकर गोली मारकर हत्या कर दी गई। आरोपी पहले से नामजद था। थानेदार लाइन हाजिर हुआ, मगर पीड़िता की जान वापस नहीं आई।
मेरठ में अवैध खनन की शिकायत करने वाले युवक ने पुलिस पर थर्ड डिग्री देने का आरोप लगाया। शिकायतकर्ता को ही हिरासत, यातना और शांतिभंग में चालान—यह व्यवस्था का उल्टा चेहरा दिखाता है।
इन घटनाओं की लंबी कतार पूछती है कि यूपी में आखिर किस कानून का राज है? दावों में ‘सेफ यूपी’ है, लेकिन खबरों में हत्या, अपहरण, पुलिस भ्रष्टाचार, सत्ता संरक्षण, थर्ड डिग्री और पीड़ितों की बेबसी है। कानून का असली राज वही होता है, जहां अपराधी डरें, पीड़ित भरोसा करें और पुलिस सत्ता की नहीं, संविधान की वर्दी पहने।

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