मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का: मंदिरों में वीआईपी दर्शन!

तड़का: मंदिरों में वीआईपी दर्शन!

कविता श्रीवास्तव

भारत की धार्मिक परंपरा में मंदिर केवल पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक समानता के प्रतीक भी हैं। मंदिरों में चाहे राजा हो या रंक वह एक भक्त ही होता है। यही कारण है कि मंदिरों में वीआईपी दर्शन की व्यवस्था समय-समय पर बहस का विषय बनती रही है। हाल ही में मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु के एक मंदिर में पैसे भरकर वीआईपी दर्शन की प्रणाली को गलत करार दिया है। कोर्ट ने कहा है कि यह भेदभावपूर्ण है। दूसरी ओर महाराष्ट्र के त्र्यंबकेश्वर मंदिर में विशेष दर्शन के लिए भारी शुल्क निर्धारित किए जाने की चर्चा है। इससे पहले वहां कुछ लोगों द्वारा श्रद्धालुओं से पैसे वसूलकर दर्शन करने की बात उठी थी। इसी बीच उत्तराखंड के पवित्र धाम केदारनाथ में दर्शन के लिए रु.१,१०० की पर्ची का नया सिस्टम लागू किया गया है। उसके लिए भी परमिशन की आवश्यकता होगी। देश के कई प्रमुख मंदिरों में इस तरह के विशेष दर्शन की व्यवस्थाएं हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या भगवान के दरबार में भी आर्थिक या सामाजिक हैसियत के आधार पर अलग-अलग व्यवस्थाएं उचित हैं? निश्चित रूप से दिव्यांगजन, वरिष्ठ नागरिक, गर्भवती महिलाएं, मरीज तथा ऐसे श्रद्धालु जो लंबे समय तक कतार में खड़े नहीं रह सकते, उनके लिए विशेष सुविधाएं उपलब्ध कराना मानवीय संवेदनशीलता और प्रशासनिक आवश्यकता दोनों है। यह सुविधा किसी विशेषाधिकार के रूप में नहीं, बल्कि सहूलियत और सहायता के रूप में देखी जानी चाहिए। लेकिन आर्थिक क्षमता के आधार पर अलग कतार या शीघ्र दर्शन की व्यवस्था कई बार समानता की भावना पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।
भारतीय संविधान में सभी नागरिकों को समानता का अधिकार है। धार्मिक स्थलों पर भी यही अपेक्षा होती है कि सबको समानता से अवसर मिले। जब सामान्य भक्त घंटों कतार में प्रतीक्षा करता है और कुछ लोग केवल शुल्क देकर कुछ ही मिनटों में दर्शन कर लेते हैं, तो स्वाभाविक रूप से असंतोष उत्पन्न होता है। हर मंदिर प्रशासन का तर्क होता है कि विशेष दर्शन से प्राप्त आय का उपयोग मंदिर के रखरखाव, सुरक्षा, सुविधाओं और सामाजिक कार्यों में किया जाता है। मंदिरों में जनप्रतिनिधियों, मंत्रियों या अन्य संवैधानिक पदाधिकारियों के लिए सुरक्षा और प्रोटोकॉल संबंधी व्यवस्थाएं आवश्यक होती हैं। इसलिए इस विषय को बल्कि व्यावहारिक रूप से भी समझना होगा। हालांकि, मंदिरों में दर्शन व्यवस्था का मूल आधार समानता और श्रद्धा होना चाहिए। विशेष सुविधाएं केवल उन लोगों तक सीमित रहें, जिन्हें वास्तव में उनकी आवश्यकता है। व्यवस्थाएं ऐसी न हों, जिससे सामान्य श्रद्धालु स्वयं को उपेक्षित महसूस करे। भगवान के समक्ष सभी समान हैं। यह केवल धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का मूल संदेश है। मंदिर प्रशासन, न्यायपालिका और समाज को मिलकर ऐसी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए, जिसमें सुविधा भी बनी रहे और समानता की भावना भी अक्षुण्ण रहे। तभी आस्था के अलावा मंदिर सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक एकता के केंद्र बने भी रहेंगे।

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