रमन मिश्र
एक जीवंत लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान यह होती है कि वहां का नागरिक अपनी समस्याओं पर खुलकर, बिना किसी डर के चर्चा कर सके। लेकिन उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से सामने आया हालिया घटनाक्रम इसके ठीक विपरीत एक बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश करता है। जहां बंद कमरे के भीतर, लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़े ‘पेपर लीक’ जैसे गंभीर मुद्दे पर चल रहे शांतिपूर्ण संवाद को रोकने के लिए भारी पुलिस बल पहुंच जाता है। यह घटना केवल एक बैठक को रोकने का मामला नहीं है, बल्कि यह हमारे लोकतांत्रिक समाज में नागरिक स्वतंत्रताओं के सिकुड़ते दायरे पर एक गंभीर सवालिया निशान खड़ा करती है।
प्रशासनिक अतिरेक का प्रमाण
आमतौर पर प्रशासन कानून-व्यवस्था की स्थिति या धारा १४४ का हवाला देकर सड़कों, चौराहों या सार्वजनिक मैदानों पर होने वाले विरोध-प्रदर्शनों को नियंत्रित या प्रतिबंधित करता है। सुरक्षा के दृष्टिकोण से इसे एक सीमा तक समझा भी जा सकता है। लेकिन जब एक बंद कमरे के भीतर, शांतिपूर्ण तरीके से हो रहे विमर्श में भी भारी पुलिस बल तैनात कर दिया जाए, तो यह प्रशासनिक अतिरेक की पराकाष्ठा है। इसका सीधा और डरावना अर्थ यह निकलता है कि अब नागरिकों का अपने निजी या बंद दायरे में भी वैचारिक आदान-प्रदान करने का मौलिक अधिकार सुरक्षित नहीं रह गया है।
मनोवैज्ञानिक दबाव और डर का माहौल
इस घटना में प्रशासनिक और पुलिस तंत्र की इतनी भारी मौजूदगी का उद्देश्य केवल चर्चा को रोकना नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना प्रतीत होता है। पेपर लीक जैसी घटनाओं के कारण देश और प्रदेश के युवा पहले से ही मानसिक और आर्थिक रूप से टूटे हुए हैं। जब ये छात्र और उनके अभिभावक अपने न्याय की बात करने पर पुलिस का भारी पहरा देखते हैं, तो उनमें व्यवस्था के प्रति भरोसा कम और डर की भावना अधिक पैदा होती है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब जनता अपनी ही चुनी हुई सरकार या प्रशासन से डरने लगे, तो वह ढांचा लोक-कल्याणकारी नहीं रह जाता।
जब व्यवस्था के पास छात्रों के ठोस और तार्किक सवालों का कोई जवाब नहीं होता, तो वह अक्सर अपनी कमियों को छिपाने के लिए बल प्रयोग या ध्यान भटकाने की रणनीतियों का सहारा लेती है।
विपक्ष की संवैधानिक भूमिका पर आघात
लोकतंत्र केवल सत्तापक्ष से नहीं, बल्कि एक मजबूत विपक्ष से पूरा होता है। विपक्ष का मुख्य काम ही पीड़ित जनता की आवाज़ को मंच देना और सरकार को उसकी कमियों के प्रति आगाह करना है। इस घटना में एक सांसद (जनप्रतिनिधि) को बंद कमरे में भी जनता से संवाद करने से रोकना यह दर्शाता है कि सत्तापक्ष विपक्ष की संवैधानिक भूमिका को स्वीकार करने के मूड में नहीं है। यह बहुदलीय लोकतांत्रिक ढांचे और स्वस्थ राजनीतिक परंपराओं के लिए एक बेहद खतरनाक संकेत है।
नौकरशाही की निष्पक्षता पर सवाल
जब पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी कानून-व्यवस्था बनाए रखने की अपनी मूल जिम्मेदारी को छोड़कर, शांतिपूर्ण ढंग से चल रहे संवाद को दबाने में अधिक सक्रिय दिखाई देते हैं, तो नौकरशाही की निष्पक्षता संदेह के घेरे में आ जाती है। इससे यह धारणा बलवती होती है कि प्रशासनिक तंत्र एक स्वतंत्र निकाय के रूप में काम करने के बजाय, सत्तापक्ष के राजनीतिक हितों को साधने का एक औज़ार बन चुका है।
किसी भी समस्या का समाधान केवल और केवल ‘संवाद’ के रास्ते से ही निकल सकता है, दमन से नहीं। पेपर लीक जैसी घटनाएं लाखों युवाओं के भविष्य को अंधकार में धकेलती हैं। ऐसे समय में प्रशासन का रवैया छात्रों को आश्वस्त करने, पारदर्शिता बरतने और समाधान खोजने का होना चाहिए, न कि सवाल उठाने वालों की आवाज़ को दबाने का। यदि चर्चा के इन शांतिपूर्ण रास्तों को प्रशासनिक बल से इसी तरह रोका जाता रहा, तो यह हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं को खोखला कर देगा और समाज को एक ऐसी दिशा में ले जाएगा जहाँ सिर्फ भय का साम्राज्य होगा।
