मुख्यपृष्ठस्तंभहनीफनामा: रहें न रहें हम महका करेंगे- सुमन कल्याणपुर

हनीफनामा: रहें न रहें हम महका करेंगे- सुमन कल्याणपुर

हनीफ जवेरी

सुमन कल्याणपुर सिर्फ एक मशहूर गायिका ही नहीं, बल्कि बहुत ही सरल, विनम्र और नेकदिल इंसान भी थीं। उनकी मधुर आवाज ने लाखों लोगों के दिलों में अपनी खास जगह बनाई। इतनी प्रसिद्धि मिलने के बाद भी उन्होंने सादगी और विनम्रता का दामन कभी नहीं छोड़ा। उनके लिए संगीत केवल एक पेशा नहीं, बल्कि एक साधना था। उनकी आवाज की तरह उनका स्वभाव भी बेहद मधुर, शांत और अपनापन भरा था।
२८ जनवरी १९३७ को सुमन हेम्माडी का जन्म कोलकाता में शंकरराव हेम्माडी और सीता हेम्माडी के घर उनकी पहली संतान के रूप में हुआ। जब सुमन तीन वर्ष की थीं, तब उनके माता-पिता ढाका (जो अब बांग्लादेश में है) चले गए। वहां परिवार में चार और बेटियों तथा एक पुत्र का जन्म हुआ। उनके पिता सेंट्रल बैंक में उच्च अधिकारी थे। वर्ष १९४३ में वे अपने परिवार के साथ मुंबई आ गए।
सुमन पढ़ाई में बहुत तेज थीं। उन्होंने अपनी शिक्षा मुंबई के सेंट कोलंबा हाई स्कूल से पूरी की और बाद में सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स में दाखिला लिया, क्योंकि उनकी रुचि चित्रकला में थी और वे एक चित्रकार बनना चाहती थीं। पुणे के प्रभात फिल्म्स के संगीतकार पंडित केशवराव भोले से उनके पिता की अच्छी मित्रता थी। इसलिए सुमन ने पेंटिंग के साथ-साथ उनसे शास्त्रीय संगीत की शिक्षा भी लेनी शुरू कर दी। हालांकि, उस समय वे यह प्रशिक्षण केवल शौक के तौर पर ले रही थीं और उन्होंने नहीं सोचा था कि आगे चलकर वे गायन के क्षेत्र में अपना करियर बनाएंगी। शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेते समय उन्हें एहसास हुआ कि उनके पास एक बेहद मधुर और सुरीली आवाज है, जिसका उपयोग गायन के क्षेत्र में किया जा सकता है। इसलिए उन्होंने चित्रकला से अपना ध्यान हटाकर संगीत की ओर लगाया। इसके बाद उन्होंने उस्ताद अब्दुल रहमान खान और गुरुजी मास्टर नवरंग से गायन की कायदे से शिक्षा प्राप्त की। गुरु पंडित केशवराव भोले की सिफारिश पर सुमन को ऑल इंडिया रेडियो पर मराठी गीत गाने का अवसर मिला। उनकी मधुर आवाज से प्रभावित होकर संगीतकार रामकृष्ण शिंदे ने उन्हें मराठी फिल्म ‘शुक्राची चांदणी’ (१९५३) में पार्श्वगायन का पहला अवसर प्रदान किया।
सन् १९५४ में सुमन को अपनी पहली हिंदी फिल्म ‘मंगू’ में गाने का अवसर संगीतकार मोहम्मद शफी ने दिया। हालांकि, बाद में फिल्म के गीत ओ. पी. नैयर ने रिकॉर्ड कराए। उसी वर्ष उनकी एक और फिल्म ‘दरवाजा’ प्रदर्शित हुई, जिसके संगीतकार नाशाद थे। सुमन को वह बड़ा अवसर तब मिला, जब गीतों की रॉयल्टी को लेकर लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी के बीच मतभेद हो गया। उस दौर में रफी ने सुमन की सिफारिश की और कई फिल्मों में उनके साथ युगल गीत गाए।
सन् १९६० से १९७० का दशक सुमन कल्याणपुर के गायन जीवन का स्वर्णिम काल रहा। इस दौरान उन्होंने अनेक प्रतिष्ठित संगीतकारों के लिए गीत गाए। हिंदी और मराठी के अलावा उन्होंने बांग्ला, गुजराती, कन्नड़, ओड़िया, भोजपुरी, पंजाबी और असमिया भाषाओं में भी अपनी मधुर आवाज का जादू बिखेरा। १९५८ में सुमन कल्याणपुर ने रामआनंद कल्याणपुर से विवाह कर अपना घर बसाया। उनसे उनकी एक बेटी चारुल अग्नी हैं, जो अमेरिका में बसी हुई हैं। एक समय सुमन ने अपनी छोटी बहन श्यामा की भी गायकी के क्षेत्र में मदद की थी। उन्होंने फिल्म दूज का चांद में श्यामा से गीत गवाए, लेकिन उन्हें विशेष सफलता नहीं मिल सकी। सुमन को कई पुरस्कारों और सम्मानों से सम्मानित किया गया, जिनमें पद्म भूषण भी शामिल है।
गत ३१ मई को मुंबई में लंबी उम्र के कारण सुमन कल्याणपुर का निधन हो गया। उनकी पोती आशानी अग्नी उनके नाम से एक एनजीओ चला रही हैं। सुमन कल्याणपुर अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन अपनी मधुर आवाज और अमर गीतों के कारण वे हमेशा लोगों के दिलों में जीवित रहेंगी।

अन्य समाचार