राजेश विक्रांत
आजमगढ़ के सुप्रसिद्ध साहित्यकार जगदीश प्रसाद बरनवाल ‘कुन्द’ हिंदी, संस्कृत और हिंदुस्थान को समर्पित कवि, नाटककार, जीवनीकार और शोधकर्ता हैं। उनकी प्रकाशित रचनाओ में विदेशी विद्वानों का हिंदी प्रेम, विदेशी विद्वानों की दृष्टि में हिंदी रचनाकार, विदेशी विद्वानों का संस्कृत प्रेम (शोध/संदर्भग्रंथ), अनुरंजिता (लेख संग्रह), सच के करीब (कहानी संग्रह), सूरज का रूप, जीवनलय (कविता-संग्रह), बिरही बिसरात (भोजपुरी नाटक), राहुल सांकृत्यायनः जिन्हें सीमायें नहीं रोक सकीं (जीवनी), सप्तमुक्ता (बाल नाटक), विविध संदर्भों में आजमगढ़ (जनपद का सांस्कृतिक इतिहास) प्रमुख हैं।
उनकी पुस्तक “गुरुभक्त सिंह ‘भक्त’: जीवन और साहित्य” में हिंदी के वर्ड्सवर्थ के रूप में चर्चित आजमगढ़ के रत्न भक्त जी के व्यक्तित्व और कृतित्व की गहन विवेचना की गई है।
पुस्तक के ‘अपनी बात’ में लेखक कुंद जी ने लिखा है कि, “हिंदी के प्रमुख प्रबंधकाव्यकारों में गुरुभक्त सिंह ‘भक्त’ का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। कविता ने उनके हृदय में बचपन में ही स्थान बना लिया था, किंतु 1920 ई. से उनकी कविताओं में परिपक्वता के दर्शन होने लगे थे। यह काल द्विवेदी युग की स्थूलता और इतिवृत्तात्मकता की प्रतिक्रिया में उद्भूत छायावाद के विकास का माना जाता है। इस दौरान कुछ कवियों ने इन दोनों प्रवृत्तियों के मध्य एक मार्ग निकालते हुए अपनी रचनाओं को स्वतंत्र गति दी। जहाँ उनमें इतिवृत्तात्मकता, वर्णनात्मकता है, वहीं प्रकृति एवं मानव मन की सूक्ष्म से सूक्ष्म अभिव्यक्तियों को भी प्रश्नय दिया गया है। आचार्य पं. रामचंद्र शुक्ल ने उन कवियों को विस्तृत अर्थ भूमि पर स्वाभाविक स्वच्छन्दता का मर्म पथ ग्रहण करके चलने वाला बताया है। इन स्वच्छंदतावादी कवियों में भक्त जी का नाम सर्वोपरि है। उनकी प्रथम कृति ‘सरस सुमन’ वर्ष 1925 ई. में प्रकाशित हुई है। इसमें प्रकाशित पाँच कविताओं पवन, भानु, चपला, जुगनू, और बसन्ती जो प्रकृति के उपादानों पर केंद्रित हैं, ने तत्कालीन हिंदी जगत पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया था। पं. रामनरेश त्रिपाठी, पं. देवीदत्त शुक्ल, पं. अमरनाथ झा आदि विद्वानों ने इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। इसकी काव्य छटा और इसमें उपस्थित नए प्रकृत प्रयोगो को देखकर हरिऔध जी ने उन्हें ‘हिंदी का वर्ड्सवर्थ’ कहकर सम्बोधित किया था। 1935 ई. में ‘नूरजहाँ’ और 1944 ई. में ‘विक्रमादित्य’ के प्रकाशन ने उन्हें चर्चित प्रबंधकाव्यकारों की श्रेणी में ला खड़ा किया। इन दोनों प्रबंध काव्यों में मानव हृदय के अंतर्द्वन्द और प्रेम की पीड़ा का सुंदर चित्र खींचा गया है।”
पुस्तक 15 अध्यायों में विभाजित है- परिवारिक परिवेश और जीवनवृत्त, प्रकृति से तादात्म्य, ललित कला, इतिहास और पुरातत्व में रुचि, स्फुट काव्यों में सौन्दर्य, प्रबंध योजना की ओर, भक्त जी का अप्रकाशित साहित्य, भक्त जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर रचित साहित्य, भक्त जी और उनके कृतित्व पर विद्वानों की सम्मतियां, नूरजहां, विक्रमादित्य, भक्त जीः व्यक्ति और कवि, परिशिष्ट, साहित्य रत्न का प्रमाण-पत्र, गुरुभक्त सिंह ‘भक्त’ की जीवन झांकी तथा भक्त जी की रचनाओं का तिथिक्रम।
पुस्तक को पढ़ने से पता चलता है कि लेखक कुंद जी ने इसे लिखने में बेहद मेहनत और शोध किया है, तभी भक्त जी के व्यक्तित्व व कृतित्व का वे सांगोपांग विश्लेषण कर पाए हैं और यह भी विसंगति सामने आती कि हिंदी जगत ने भक्त जी को वह सम्मान नहीं दिया, जिसके वे अधिकारी थे। उन पर बहुत ज्यादा शोध भी नहीं हुए हैं, जबकि भक्त जी बहुत बड़े कद के साहित्य सेवी थे। वे छायावाद की परिधि में स्वच्छंदतावाद के प्रमुख स्तम्भ थे। उनकी कविताएं सौंदर्य, प्रेम, रस, रोमांस और ओज से ओतप्रोत हैं। उनमें स्वच्छंद धारा सम्पूरित निर्झरिणी कल-कल ध्वनि से अविरत प्रवाहित होती दिखायी पड़ती है। कथा क्रम में कहीं सपाट बयानी की जिज्ञासापरक निश्छल सरलता टपकती है तो कहीं दर्शन एवं रहस्यमयिता जैसे गम्भीर विषय भी चिंतन सागर में डूबने, उतराते रहने का आनंद भाव पैदा करने में समर्थ होते हैं।
प्रकृति चित्रण और मुहावरों के प्रयोग में वह बेजोड़ थे। परम्परित ढरें से हटकर रची गयीं उनकी रचनाएं, विविध रम्य शब्दचित्रों, अलंकृत शैली और रसपरिपाक से भरपूर हैं तथा हिंदी साहित्य में एक नए प्रयोग से परिचित कराती है।
ऐसे भूले बिसरे साहित्यकार के व्यक्तित्व व कृतित्व से परिचित कराने के लिए “गुरुभक्त सिंह ‘भक्त’: जीवन और साहित्य” लिखकर जगदीश प्रसाद बरनवाल ‘कुन्द’ ने उल्लेखनीय कार्य किया है। पुस्तक का प्रकाशन संकल्प प्रकाशन, दिल्ली ने किया है। पृष्ठ संख्या 152 एवं मुल्य 400 रुपए है।
