मैक ब्रो
कवि गिरधर कविराय जी कह गए हैं, ‘बिना विचारे जो करे, सो पाछे पछताए, काम बिगाड़े आपनो, जग में होत हंसाए।’ अब इस बात को हमरे कंपूटर वाले बाबू, यानी बिल गेट्स साहेब से बेहतर अऊर कौन समझ सकत है? दुनियाभर को एंटी-वायरस बेचनेवाले गेट्स भैया खुद एक ऐसे वायरस की चपेट में आए गए हैंन कि अब बंद कमरे में अमेरिकी सांसदों के सामने कफन फाड़कर रो रहे हैं।
मामला वही पुराना है, जेफ्री एपस्टीन नाम के एक ठग से यारी। अब बिल बाबू कह रहे हैं कि ऊ जालसाजवा से मिलना मेरी जिंदगी की सबसे ‘गंभीर भूल’ थी। अरे भैय्या, ‘आ बैल मुझे मार’ वाली कहावत तो सुनी ही होगी? जब दुनिया जहान के पचड़ों से दूर अपनी खिड़की (विंडो) चमका रहे थे, तब उस दुष्ट के चंगुल में फंसने की का जरूरत थी भाई? अब कहत रहन हैं कि ऊ ससुर का नाती परोपकार के नाम पर अरबों डॉलर जुटाने का गाजर दिखा रहा था। इसे कहते हैं ‘लोभ पाप का मूल’! दरअसल, बिल बाबू ने दुनियाभर की पढ़ाई तो कर ली थी, लेकिन हिंदुस्थान के महान संतों का ‘फलसफा’ पढ़ना भूल गए थे!
मजे की बात देखिए, जब गेट्स साहब को समझ आया कि बंदा चूना लगा रहा है और उन्होंने पल्ला झाड़ा, तो एपस्टीन भाई ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ वाली नीति पर उतर आया। उसने गेट्स साहब के घर की अंदरूनी खबरें और कथित अफेयर के किस्से निकालकर उन्हें ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया। मतलब, ‘एक तो चोरी, ऊपर से सीनाजोरी’!
अब बिल बाबू सफाई दे रहे हैं कि मैं कभी उसके कुख्यात टापू पर नहीं गया। पर हुजूर, ‘काजल की कोठरी में वैâसो हू सयानो जाए, एक लीक लागी है पे लागी है’। बदनामी का जौन दाग लगै का रहा था, उ तो लगै गया। अब आपन वेबसाइटीया पर ज्ञान बांट रहे हैं कि इस घटना ने हमरी इज्जत मिट्टी में मिलाय दी है। सच है, ‘अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत’। चौधराहट के चक्कर में ऐसा रायता पैâलाया है कि अब समेटे नहीं सिमट रहा!
