कुछ आंसुओं की बूंदें
नयनों के कोर से टपक
मेरे अंक में आ गिरीं,
और अंतर्मन की वेदना छलक गई।
कल विदाई हुई थी मेरी,
आज ससुराल में पहला दिन।
खोल रही अपना सामान,
एक पोटली सबसे पहले हाथ में आई।
हौले से, पर भारी मन से,
मैंने पोटली उठाई,
क्योंकि उसमें छुपा बंधा था
मेरा बचपन।
उलट-पलट, माथे से लगा,
रख दिया तकिए के नीचे।
गुड़िया थी मेरी,
खेली थी तब,
जब मैं भी मां की गुड़िया थी।
मां ने मुझे कोख से जन्मा,
मेरी गुड़िया बनी थी उनके हाथों से।
अबोध थी जब,
कहा था मैंने,
मेरे साथ गुड़िया भेज देना
मेरी ससुराल में।
मां, तुम अपनी भूल आई थी,
मेरी अवश्य रख देना
मेरे सामान में।
मेरा बचपन मेरे हाथों में है,
नयनों से अश्रु ढुलक रहे हैं।
बेटी के सुख का सामान
देना कभी नहीं भूलती मां।
बेला विरदी
