-राजनीतिक अड़चन के चलते १७ सालों से लटका मुंबई-गोवा महामार्ग
-मनसे अध्यक्ष ने पूछा ठेकेदार भाग गए तो जवाबदार कौन?
सामना संवाददाता / मुंबई
पिछले १७ वर्षों से बन रहे मुंबई-गोवा महामार्ग के निर्माण में हो रही अड़चन को लेकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना अध्यक्ष राज ठाकरे ने राज्य सरकार और स्थानीय राजनीतिक व्यवस्था पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि महामार्ग का काम विकास की कमी के कारण नहीं, बल्कि राजनीतिक हस्तक्षेप और ‘टक्केवारी’ की राजनीति के कारण अटका हुआ है। उन्होंने कहा कि काम से ज्यादा टक्केवारी की चिंता करनेवाली महायुति सरकार की इच्छाशक्ति कम है। सरकार की लापरवाही की वजह से आम जनता को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।
कोकणवासियों को गुजरना पड़ रहा है गड्ढों और यातायात जाम के बीच राज ठाकरे ने सरकार पर बोला हमला
उन्होंने कहा कि चुनाव के समय रोजगार, पानी और सड़क जैसे मुद्दे बार-बार सामने आते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही जनता की मूलभूत समस्याएं फिर पीछे चली जाती हैं। मुंबई-गोवा महामार्ग को लेकर पिछले १५-१७ वर्षों से केवल आश्वासन ही सुनने को मिल रहे हैं। वही गड्ढे, वही यातायात जाम और वही समस्याएं आज भी कायम हैं।
रविवार को मुंबई-गोवा महामार्ग के कारण कोकणवासियों को हो रही परेशानी का जायजा लेने राज ठाकरे ने मानगांव बायपास का निरीक्षण किया। इसके बाद पत्रकार परिषद में राज ठाकरे ने कहा कि मुंबई-गोवा महामार्ग का काम १७ वर्षों से चल रहा है, लेकिन आज भी कोकणवासियों को उसी सड़क, उन्हीं गड्ढों और उसी यातायात जाम से गुजरना पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि कोकण में घूमने के बाद ही पता चलता है कि खराब सड़क और अधूरे विकास की कीमत आम जनता किस तरह चुका रही है। उन्होंने कहा कि सरकार का ध्यान काम वैâसे पूरा होगा, इसकी बजाय कितने प्रतिशत मिलेंगे, इस पर ध्यान दिया जाता है। राज ठाकरे ने केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी से हुई पुरानी बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने एक बार मुंबई-गोवा महामार्ग को लेकर गडकरी को फोन किया था। उस समय गडकरी ने उनसे कहा था कि कई ठेकेदार काम से परेशान होकर भाग गए।
यदि ठेकेदार भाग गए तो वे किसके कारण भागे?
राज ठाकरे ने महाराष्ट्र में जमीन की खरीद-बिक्री को लेकर भी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि फिलहाल जमीन बेचना ही जैसे सबसे बड़ा कारोबार बन गया है। राज ठाकरे ने स्पष्ट किया कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं। लेकिन विकास के नाम पर स्थानीय लोगों को अंधेरे में रखकर उनकी जमीन और संसाधनों पर बाहरी लोगों का कब्जा नहीं होना चाहिए।
