हजारों बच्चों का भविष्य अधर में शिक्षा मंत्री की उदासीनता
फिरोज खान / मुंबई
महाराष्ट्र सरकार और शिक्षा मंत्री की कथित लापरवाही की कीमत अब झुग्गी-झोपड़ियों में रहनेवाले गरीब बच्चों को चुकानी पड़ रही है। शहर में १६४ बिना अनुमति चल रहे स्कूलों की पहचान हुई है, जिनमें से ६४ अकेले एम-ईस्ट वार्ड यानी गोवंडी, मानखुर्द और ट्रॉम्बे में हैं। इनमें से ३६ स्कूलों को बंद करने का नोटिस जारी कर दिया गया है। सवाल यह है कि अगर ये स्कूल १५ साल से चल रहे थे तो सरकार अब तक क्यों सोती रही?
झुग्गी बच्चों के अंग्रेजी माध्यम के सपने पर ताला
१५ साल से फाइलें अटकाए बैठी रही सरकार
उन्होंने कहा कि यदि सरकार को गरीब बच्चों की शिक्षा की वास्तव में चिंता है तो अव्यावहारिक शर्तों में बदलाव किया जाए, अस्थायी मान्यता दी जाए और बच्चों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए।
गोवंडी के बैगनवाड़ी में सुबह होते ही तंग गलियों में स्कूल जानेवाले बच्चों की भीड़ उमड़ती है। एक से तीन मंजिला इमारतों में चल रहे इन स्कूलों में हजारों बच्चे अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने आते हैं। छोटे-छोटे क्लासरूम, टूटी बेंच और कई जगह फर्श पर बैठकर पढ़ते बच्चे- इन तमाम मुश्किलों के बावजूद यही स्कूल गरीब परिवारों के बच्चों के लिए शिक्षा का सहारा बने हुए हैं। लेकिन अब यही स्कूल सरकार की नजरों में आ गए हैं। ८०० छात्रों वाले एक स्कूल के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की गई है।
सरकार का कहना है कि मान्यता के लिए ५,००० वर्ग फुट का प्लॉट, ३० साल की लीज, २१ लाख रुपए का डिपॉजिट और अग्निशमन एवं भवन संबंधी मंजूरी जरूरी है। स्कूल संचालकों का सवाल है कि झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले गरीब स्कूल संचालक इतनी कठोर शर्तें वैâसे पूरी करेंगे? स्कूल प्रबंधन का कहना है, ‘यहां १-२ साल की लीज का भरोसा नहीं मिलता, जबकि सरकार ३० साल की लीज मांग रही है। यानी सरकार नियम बनाकर अपनी जिम्मेदारी से हाथ झाड़ लेना चाहती है।’
अभिभावकों को भी नहीं थी जानकारी
अधिकांश अभिभावकों को पता ही नहीं था कि उनके बच्चों का स्कूल मान्यता प्राप्त नहीं है। शाहनव सिद्दीकी जैसे अभिभावकों ने बताया कि स्कूल घर के पास था इसलिए बच्चों को वहां भेजा। १०वीं और १२वीं के विद्यार्थियों को कागजों पर किसी मान्यता प्राप्त स्कूल में ट्रांसफर दिखाकर बोर्ड की परीक्षा दिलाए जाने का भी दावा किया जा रहा है। सवाल यह है कि शिक्षा विभाग को १५ साल तक यह कथित ‘जुगाड़’ नजर क्यों नहीं आया?
२०११ से मान्यता के लिए आवेदन कर रहे एक स्कूल का मामला आज भी ७/१२ रिकॉर्ड के नाम पर अटका हुआ है। स्कूल के वकील का आरोप है कि स्कूल को नियमितीकरण की सूची में शामिल किया गया था, लेकिन बाद में मजबूरी में बाहर कर दिया गया।
