मुख्यपृष्ठस्तंभविशेष: राहुल सांकृत्यायन और कवि धूमिल की मूर्ति तोड़कर क्या मिला

विशेष: राहुल सांकृत्यायन और कवि धूमिल की मूर्ति तोड़कर क्या मिला

रमन मिश्र

किसी भी स्वस्थ संस्कृति की पहचान उसकी विविधता, सहिष्णुता और असहमतियों का सामना करने की क्षमता से होती है। भारत की सनातन और बौद्ध परंपराएं सदियों से शास्त्रार्थ (वैचारिक संवाद) की पक्षधर रही हैं। भारतीय दर्शन और संस्कृति में असहमति का मतलब ‘शत्रुता’ नहीं, बल्कि सत्य के अन्वेषण की एक नई खिड़की माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता में भी, कृष्ण पूरा उपदेश देने के बाद अर्जुन पर अपना विचार थोपते नहीं हैं, बल्कि अंत में (अध्याय १८, श्लोक ६३) कहते हैं- ‘विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु’ (अर्थात मैंने तुम्हें पूरा ज्ञान दे दिया है, अब इस पर अच्छी तरह विचार करो और जो तुम्हें सही लगे, वह करो)। बुद्ध और महावीर ने जब वेदों की सत्ता को मानने से साफ इनकार कर दिया था, सदियों तक बौद्ध भिक्षुओं, जैन मुनियों और वैदिक आचार्यों (जैसे कुमारिल भट्ट और उदयनाचार्य) के बीच शास्त्रार्थ चलते रहे। नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय इसी वैचारिक मंथन के केंद्र थे। भारतीय परंपरा की उदारता का सबसे बड़ा प्रमाण ‘चार्वाक दर्शन’ (लोकायत) है। चार्वाक ने ईश्वर, आत्मा, पुनर्जन्म, स्वर्ग-नरक और वेदों को पूरी तरह से नकार दिया। गौर करनेवाली बात यह है कि घोर भौतिकवादी और नास्तिक होने के बावजूद चार्वाक के विचारों को संकलित किया गया, उन्हें ‘चार्वाक दर्शन’ के रूप में षड्दर्शनों के साथ पढ़ाया गया और उनके प्रणेता को ‘ऋषि चार्वाक’ कहा गया। उन्हें किसी कुप्रâ या धर्मद्रोह का दोषी नहीं माना गया। यही कारण है कि आज के दौर में जब मूर्तियां तोड़कर या हिंसा के बल पर असहमति को दबाने की कोशिश की जाती है तो वह भारतीय दर्शन की इस महान, सहिष्णु और तार्किक विरासत का सीधा अपमान है।
कट्टरपंथ चाहे किसी भी धर्म, रंग या राजनीतिक चश्मे से उपजा हो, उसका मूल चरित्र और व्यवहार बिल्कुल एक जैसा होता है। अफगानिस्तान के बामियान में तालिबान द्वारा बुद्ध की विशाल प्रतिमाओं को बारूद से उड़ाना और भारत में कट्टरपंथी तत्वों द्वारा राहुल सांकृत्यायन या कवि धूमिल की मूर्तियों को खंडित करना- ये दोनों घटनाएं एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
कट्टरपंथी चाहे वह इस्लामी हो, ईसाई हों या हिंदू, वह संस्कृति को ‘मोनोलिथिक’ (एक जैसा सपाट) बनाना चाहता है। वह विविधता से डरता है। बामियान में बुद्ध की प्रतिमा उस क्षेत्र के समृद्ध बौद्ध और गांधार अतीत की गवाह थी, जिसे कट्टरपंथ बर्दाश्त नहीं कर सका। ठीक इसी तरह, भारत में राहुल सांकृत्यायन और कवि धूमिल जैसे कलमकारों की उपस्थिति उस बहुआयामी भारतीय चेतना का प्रतीक है, जो कट्टरपंथियों की संकीर्ण राजनीतिक परिभाषा में फिट नहीं बैठती।
संस्कृति एक निरंतर बहती नदी है, जिसमें समय के साथ कई धाराएं आकर मिलती हैं। कट्टरपंथी मनोविज्ञान इतिहास को एक संकुचित खिड़की से देखता है और अपनी सुविधानुसार अतीत का यशोगान करना चाहता है।
बुद्ध एशिया की चेतना हैं और राहुल-धूमिल आधुनिक भारतीय मेधा के प्रतीक। जब कोई कट्टरपंथी राहुल सांकृत्यायन या धूमिल की मूर्ति तोड़ता है तो वह वास्तव में अपनी ही भाषा, अपनी ही मिट्टी और अपने ही समाज के नायकों का अपमान कर रहा होता है। यह ठीक वैसी ही आत्मघाती प्रवृत्ति है जैसी तालिबान ने दिखाई थी- अपनी ही जमीन के गौरवशाली गांधार इतिहास को मटियामेट करके।
सांस्कृतिक दृष्टि से किसी विचार का विरोध विचार से, पुस्तक का विरोध पुस्तक से और कविता का विरोध कविता से होना चाहिए। यही मनुष्य के सुसंस्कृत होने की शर्त है। कट्टरपंथ मनुष्य की सोचने-समझने की तर्कशक्ति को कुचल देता है और उसकी जगह ‘सामूहिक उन्माद’ को जन्म देता है। जब तर्क खत्म हो जाते हैं तो हाथ में हथियार या बारूद आ जाता है। बामियान के कट्टरपंथियों के पास बुद्ध के शांति और करुणा के दर्शन का कोई काट नहीं था और भारतीय संदर्भ में इन हुड़दंगियों के पास धूमिल के जलते हुए तीखे सवालों और राहुल जी के अकादमिक तर्कों का कोई बौद्धिक जवाब नहीं है। इसलिए वे मूर्तियों पर प्रहार करके अपनी वैचारिक पराजय को छिपाने की कोशिश करते हैं।
सच्ची संस्कृति जोड़ती है, विस्तार देती है और इंसानी संवेदना को गहरा करती है। इसके विपरीत कट्टरपंथ का अंतिम प्रतिफल सांस्कृतिक मरुस्थलीकरण ही होता है, जहां असहमति के फूल खिलना बंद हो जाते हैं। इसलिए एक सजग नागरिक और साहित्यानुरागी के रूप में, किसी भी रंग के कट्टरपंथ को बिना किसी दोहरे मापदंड को समान रूप से बर्बर और असांस्कृतिक माना जाना चाहिए।

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