अनिल तिवारी / मुंबई
फडणवीस बोले; ठेका जाति, भाषा देखकर नहीं, क्षमता देखकर मिलता है; तब सवाल यह कि हर बड़ी परियोजना में बार-बार गुजरात और अडानी ही क्यों दिखाई देते हैं?
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का कहना है कि सरकारी ठेके देते समय किसी की जाति, भाषा या धर्म नहीं देखा जाता। ठेका उसे मिलता है, जिसमें काम पूरा करने की क्षमता होती है। सैद्धांतिक तौर पर मुख्यमंत्री की बात सौ फीसदी सही है। सरकारी काम न मराठी देखकर दिया जाना चाहिए, न गुजराती देखकर और न किसी दूसरी पहचान के आधार पर। लेकिन फडणवीस का यही जवाब एक उससे भी बड़ा सवाल खड़ा करता है, क्या पिछले कुछ वर्षों में देश की सारी ‘क्षमता’ गुजरात में ही जाकर समा गई है? प्रयागराज-नासिक में कुंभ की तैयारी हो या अयोध्या-काशी समेत देश के दूसरे हिस्सों में छोटी से बड़ी इंप्रâास्ट्रक्चर परियोजनाएं, हर बार गुजरात से जुड़ी कंपनियां और कारोबारी समूह ही क्यों? आखिर महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, बंगाल, कर्नाटक, तमिलनाडु या देश के दूसरे राज्यों में बड़ी परियोजनाएं संभाल सकने वाले ठेकेदार और उद्योगपति खत्म हो गए हैं क्या?
‘क्षमता’ का पैमाना है तो आंकड़े सार्वजनिक कीजिए
मुख्यमंत्री कहते हैं कि जो कंपनी काम करने में सक्षम है, उसे ठेका मिलेगा। तब सरकारों को यह भी सार्वजनिक करना चाहिए कि संबंधित निविदा में कितनी कंपनियां आईं, किसके तकनीकी अंक कितने थे, किसकी वित्तीय बोली क्या थी और स्थानीय कंपनियां किस आधार पर बाहर हुईं। वरना ‘क्षमता’ ऐसा जादुई शब्द बन सकता है जिसके सहारे किसी भी बड़े ठेके को सही ठहराया जा सके। सबसे बड़ा उदाहरण एयरपोर्ट का है। केंद्र सरकार के अपने रिकॉर्ड के अनुसार अमदाबाद, लखनऊ, मंगलुरु, जयपुर, गुवाहाटी और तिरुवनंतपुरम, छह AAघ् एयरपोर्ट झ्झ्झ् मॉडल पर अडानी एंटरप्राइजेज को मिले। अडानी को एयरपोर्ट मैनेजमेंट का कौन सा अनुभव था या उनमें कौन सी क्षमता थी? सरकार का कहना है कि अडानी सभी छह में सबसे ऊंची बोली लगाने वाला सफल बोलीदाता था और प्रक्रिया खुली प्रतिस्पर्धी बोली से हुई थी। आज अडानी समूह स्वयं बताता है कि उसके पोर्टफोलियो में आठ एयरपोर्ट हैं और वह भारत की सबसे बड़ी एयरपोर्ट इंप्रâास्ट्रक्चर कंपनियों में है। समूह बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स, बिजली उत्पादन, पावर ट्रांसमिशन, गैस, इंप्रâास्ट्रक्चर, सीमेंट, रियल एस्टेट और अन्य क्षेत्रों में भी बड़ी मौजूदगी रखता है। वैâसे? पिछले १०-१२ वर्षों में जल, जंगल, जमीन और जायदाद समेत कोयला, पोर्ट, रेल, ऊर्जा, सड़क, इंप्रâास्ट्रक्चर सभी कुछ खुले हाथों से अडानी की झोली में डाल दिया गया।
सवाल अडानी के सफल होने का नहीं, आर्थिक शक्ति के केंद्रीकरण का है।
किसी गुजराती कंपनी का ठेका जीतना अपराध नहीं है। अडानी या किसी दूसरे उद्योग समूह का विस्तार भी अपने-आप में गलत नहीं कहा जा सकता। सवाल तब पैदा होता है जब बंदरगाह से एयरपोर्ट, बिजली से कोयला, जमीन से पुनर्विकास और इंप्रâास्ट्रक्चर तक लगातार कुछ चुनिंदा बड़े समूहों की मौजूदगी बढ़ती दिखाई दे। महाराष्ट्र में धारावी सहित अन्य पुनर्विकास की विशाल परियोजनाओं का क्रियान्वयन भी अडानी से जुड़ी कंपनी कर रही है। ऐसे में यह पूछना जनता का लोकतांत्रिक अधिकार है कि देश विकास कर रहा है या विकास के अवसरों का अत्यधिक केंद्रीकरण हो रहा है?
२०१४ से पहले भारत में क्षमता नहीं थी क्या?
यही फडणवीस के बयान की सबसे बड़ी राजनीतिक कमजोरी है। यदि हर बार जवाब यही दिया जाएगा कि ‘सबसे सक्षम कंपनी को काम मिला’, तो फिर यह सवाल स्वाभाविक है कि २०१४ से पहले भारत की सड़कें कौन बनाता था? बांध कौन बनाता था? बिजलीघर, आईआईटी, एम्स, इंप्रâास्ट्रक्चर कौन खड़े करता था? रेलवे, बंदरगाह, हवाई अड्डे और शहर किसने बनाए? क्या तब महाराष्ट्र, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, बंगाल, पंजाब और दूसरे राज्यों के इंजीनियर, ठेकेदार और उद्योगपति सक्षम थे और अचानक उनकी क्षमता समाप्त हो गई?
भारत में दशकों से हजारों बड़ी-मझोली निर्माण और इंजीनियरिंग कंपनियां मौजूद रही हैं। इसलिए यदि बड़े सरकारी प्रोजेक्ट लगातार सीमित कंपनियों के हाथ में केंद्रित होते दिखाई दें तो सरकार का काम सवाल पूछने वालों को भाषाई राजनीति का आरोपी बनाना नहीं, बल्कि निविदा प्रक्रिया का पूरा हिसाब जनता के सामने रखना होना चाहिए।
मुख्यमंत्री हैं या गुजरात मॉडल के प्रवक्ता?
फडणवीस को यह जरूर कहना चाहिए कि गुजराती होने के कारण किसी कंपनी को ठेके से वंचित नहीं किया जा सकता। मगर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री होने के नाते उन्हें यह भी पूछना चाहिए कि महाराष्ट्र की कंपनियां क्यों पीछे रह रही हैं? राज्य सरकार उन्हें प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए क्या कर रही है? हजारों करोड़ रुपए महाराष्ट्र में खर्च होने हैं तो स्थानीय उद्योग, इंजीनियर, श्रमिक और सप्लायर उस आर्थिक गतिविधि में कितने सहभागी होंगे?
राज्यहित की बात करना गुजराती-विरोध नहीं है
अगर नासिक में महाराष्ट्र के पैसे से महाराष्ट्र का कुंभ तैयार हो रहा है, तो यह जानना जनता का अधिकार है कि पैसा कहां जा रहा है, किस कंपनी को जा रहा है और महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था को उससे कितना फायदा मिलने वाला है।
लेकिन ठेका देने से पहले क्या देखा?
फडणवीस ने कहा है कि काम की गुणवत्ता जांचने के बाद ही भुगतान होगा। यह स्वागत योग्य बात है, मगर सवाल भुगतान का ही नहीं, चयन प्रक्रिया का भी है। सरकार को बताना चाहिए कि कितने ठेके निकले? कितने महाराष्ट्र के ठेकेदारों ने आवेदन किया? कितनी बाहरी कंपनियों ने आवेदन किया? तकनीकी अर्हता किसने तय की? किस आधार पर कंपनियां बाहर हुईं? क्या टेंडर की शर्तें ऐसी थीं कि केवल बेहद बड़े कारोबारी घराने ही पात्र रह जाएं? इन सवालों का जवाब मिल जाए तो विवाद अपने-आप खत्म हो जाएगा।
देश ‘एक भारत’ है तो अवसर भी पूरे भारत को दिखने चाहिए
फडणवीस सही कहते हैं कि ठेकेदार की जाति, धर्म और भाषा नहीं देखी जानी चाहिए। लेकिन इसी सिद्धांत का दूसरा हिस्सा भी है, प्रतिस्पर्धा ऐसी होनी चाहिए कि अवसर केवल कुछ प्रदेशों और कुछ कॉरपोरेट घरानों तक सीमित दिखाई न दें। जब देश के अलग-अलग हिस्सों में जनता बार-बार एक ही सवाल पूछने लगे, ‘हर बड़ी परियोजना में आखिर वही कुछ नाम क्यों?’ तो सरकार को नाराज होने के बजाय आंकड़े सामने रखने चाहिए। वरना ‘क्षमता’ का तर्क सरकार के बचाव का सबसे सुविधाजनक कवच बन जाएगा। और फिर जनता पूछेगी ही, क्या १४० करोड़ लोगों के इस देश में हुनर की खान सिर्फ गुजरात में है?
क्या महाराष्ट्र में ठेकेदार नहीं बचे?
क्या बाकी भारत में उद्योगपति नहीं बचे? और क्या विकास का अर्थ अब कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट घरानों का लगातार विस्तार ही रह गया है?
यही वे सवाल हैं जिनका जवाब मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के ‘क्षमता’ वाले बयान से नहीं, बल्कि ठेकों और निविदाओं के पारदर्शी आंकड़ों से मिलना चाहिए।
