नाराज हूं,
पर मेरी नाराजगी का
किसी को कोई फर्क
पड़ता भी है या नहीं,
यह सोचने की फुर्सत भी
कहां रही अब।
किससे कहूं अपना शिकवा,
किसे सुनाऊं मन की थकान,
खुद से ही अनजान बैठा हूं,
जैसे भीड़ में खो गई हो
मेरी पहचान।
टूट चुका है भरोसा
दिखावे से भरे जगत पर,
जहां रिश्ते तो रहते हैं साथ,
पर एहसास अक्सर
छूट जाते हैं सफर में।
हालात स्वभाव बदल देते हैं,
पर इंसान तो वही रहता है,
फिर क्यों किसी के होने
या न होने से अब किसी को
कोई फर्क नहीं पड़ता है?
एक उम्मीद जिंदा रहती है
कि कभी तो कोई पूछेगा,
“आप चुप क्यों हैं?”
कभी तो किसी को हमारी
नाराजगी में भी छिपा हुआ
प्यार दिखाई देगा।
क्योंकि सच तो यह है कि
नाराज वही होता है,
जिसे अब भी अपनापन होने की
उम्मीद होती है,
वरना बेगानों से कोई
शिकायत नहीं करता।
नाराजगी में भी छिपा
अनकहा प्यार होता है,
हर खामोशी के पीछे कोई
इंतजार होता है।
जो रिश्ते दिल के
सबसे करीब होते हैं अक्सर,
शिकवा भी उन्हीं से
और उन्हीं पर ऐतबार होता है।
मुनीष भाटिया / मोहाली
