रोहित माहेश्वरी / लखनऊ
प्रयागराज जीआरपी द्वारा स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को क्लीन चिट दिए जाने का मामला केवल एक कानूनी निष्कर्ष नहीं, बल्कि उन आरोपों पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न है, जिन्होंने पिछले कुछ महीनों में व्यापक चर्चा बटोरी थी। दरअसल, आयुषोतोष ब्रह्मचारी ने आरोप लगाया था कि मार्च २०२६ में प्रयागराज आने के दौरान उन पर जानलेवा हमला कराया गया, जिसके पीछे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके कुछ शिष्यों की साजिश थी। इस आरोप के आधार पर एफआईआर दर्ज हुई और मामला जांच के दायरे में आया। हालांकि, जीआरपी की विस्तृत विवेचना में आरोपों की पुष्टि नहीं हो सकी। पुलिस ने मेडिकल रिपोर्ट, उपलब्ध साक्ष्यों और अन्य तथ्यों का परीक्षण करने के बाद अपनी अंतिम रिपोर्ट न्यायालय में दाखिल कर दी, जिसमें स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सहित नामजद लोगों को क्लीन चिट दी गई है।
तिकड़ी की खिचड़ी!
उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों शह और मात का खेल दिलचस्प मोड़ पर आ गया है। २०२७ के विधानसभा चुनावों की बिसात अभी से बिछनी शुरू हो चुकी है। इसी बीच, कद्दावर नेता स्वामी प्रसाद मौर्य और आजाद समाज पार्टी के सांसद चंद्रशेखर आजाद की हालिया मुलाकात ने राज्य के राजनैतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। चर्चाएं गर्म हैं कि यह मुलाकात महज एक शिष्टाचार भेंट नहीं, बल्कि यूपी में एक नए `तीसरे मोर्चे’ की नींव है। कयास लगाए जा रहे हैं कि इस गठबंधन में एआईएमआईएम (Aघ्श्घ्श्) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी भी शामिल हो सकते हैं। अगर ऐसा होता है, तो यह मोर्चा सीधे तौर पर दलित, पिछड़े और मुस्लिम वोट बैंक को साधने की कोशिश करेगा। अब देखना यह होगा कि स्वामी प्रसाद मौर्य, चंद्रशेखर और ओवैसी की यह संभावित तिकड़ी चुनावी जमीन पर कुछ कमाल दिखा पाती है, या यह सिर्फ एक सियासी पैंतरा बनकर रह जाएगी।
आस्था पर प्रहार या भ्रष्टाचार की छूट?
अयोध्या में राम मंदिर के चढ़ावे में करोड़ों रुपयों की कथित हेराफेरी का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख अखिलेश यादव ने सीधे तौर पर भाजपा सरकार और मंदिर ट्रस्ट को कटघरे में खड़ा किया है। सपा का आरोप है कि भाजपा धर्म के नाम पर राजनीति तो करती है, लेकिन पवित्र चढ़ावे की सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित करने में पूरी तरह नाकाम रही है। बढ़ते राजनैतिक दबाव और चौतरफा घिरने के बाद उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने आनन-फानन में तीन सदस्यीय एसआईटी का गठन कर जांच के आदेश दिए हैं। विपक्ष का कहना है कि यह एसआईटी सिर्फ लीपापोती और असली दोषियों को बचाने का एक जरिया है।
