मुख्यपृष्ठस्तंभकोर्ट-रूम : संपत्ति की रक्षा में आत्मरक्षा का अधिकार

कोर्ट-रूम : संपत्ति की रक्षा में आत्मरक्षा का अधिकार

एड. कनई बिस्वास
कानून केवल व्यक्ति की जान की ही नहीं, बल्कि उसकी संपत्ति की रक्षा का अधिकार भी देता है। लेकिन संपत्ति की रक्षा में कितना बल प्रयोग किया जा सकता है और उसकी सीमा क्या होगी, यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), २०२३ की धारा १०३, १०४ और १०५ इसी अधिकार और उसकी सीमाओं को स्पष्ट करती हैं।
केस स्टडी – १: ‘संपत्ति की रक्षा में घातक बल’ (धारा १०३)
रात में कुछ हथियारबंद लोग एक घर में डवैâती करने घुस गए। घर के मालिक ने परिवार और संपत्ति की रक्षा के लिए हमला किया, जिससे एक हमलावर की मृत्यु हो गई।
अदालत क्या देखेगी?
क्या अपराध गंभीर था? क्या डवैâती या जानलेवा हमला हुआ? क्या आत्मरक्षा के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था?
पैâसला- यह संपत्ति की रक्षा में वैध आत्मरक्षा का मामला हो सकता है। समझें: धारा १०३ के तहत डवैâती, घर में जबरन घुसपैठ या आगजनी जैसे गंभीर अपराधों में संपत्ति की रक्षा करते हुए मृत्यु तक का कारण बनना वैध हो सकता है।
केस स्टडी – २: ‘सीमित बल प्रयोग’ (धारा १०४)
एक व्यक्ति खेत से फल चोरी कर रहा था। खेत के मालिक ने उसे पकड़कर हल्का बल प्रयोग किया और पुलिस के हवाले कर दिया।
अदालत क्या देखेगी?
क्या अपराध गंभीर नहीं था? क्या जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग नहीं किया गया? क्या उद्देश्य केवल रोकना था?
फैसला- यह सीमित आत्मरक्षा का मामला है। समझें: धारा १०४ के अनुसार छोटे या गैर-गंभीर अपराधों में केवल आवश्यक और सीमित बल प्रयोग ही वैध माना जाएगा।
केस स्टडी- ३: ‘संपत्ति की रक्षा का अधिकार कब तक?’ (धारा १०५)
एक चोर घर से सामान लेकर भाग रहा था। कुछ दूरी तक पीछा करने के बाद भी घर के मालिक ने उसे पीटना जारी रखा।
अदालत क्या देखेगी?
क्या खतरा समाप्त हो चुका था? क्या हमला बदले की भावना से जारी रहा? क्या आत्मरक्षा की सीमा पार की गई?
पैâसला- यह आत्मरक्षा की सीमा से बाहर का मामला हो सकता है। समझें: धारा १०५ के तहत संपत्ति की रक्षा का अधिकार केवल तब तक रहता है, जब तक खतरा जारी हो। खतरा समाप्त होने के बाद हमला जारी रखना अपराध बन सकता है। भारतीय न्याय संहिता यह स्पष्ट करती है कि व्यक्ति को अपनी संपत्ति की रक्षा का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार संतुलित और परिस्थितियों के अनुसार ही इस्तेमाल किया जा सकता है। कानून सुरक्षा की अनुमति देता है, प्रतिशोध की नहीं। यानी, आत्मरक्षा का उद्देश्य संपत्ति और जीवन की रक्षा है, बदला लेना नहीं।
(अगले अंक में: धारा १०६, १०७ और १०८ – ‘आत्मरक्षा में निर्दोष को नुकसान और अपराध के लिए उकसाना’ को आसान उदाहरणों के साथ समझेंगे।)

अन्य समाचार