बाल केशव ठाकरे नाम के एक धारदार कूची वाले व्यंग्यचित्रकार ने दुनिया की सियासत में एक करिश्मा कर दिखाया। उस करिश्मे का नाम है शिवसेना। शिवसेना की स्थापना के इस ऐतिहासिक सफर को आज ६० साल पूरे हो चुके हैं। इस दौरान शिवसेना ने अनगिनत हमले झेले, जीत-हार देखी और हर तरह का जहर पीकर भी हिमालय के नीलकंठ की तरह अडिग खड़ी रही। शिवसेना को नोचने और उसके टुकड़े करने की कोशिशें भी खूब हुईं, क्योंकि इसके पीछे शिवसेना का वह खौफ था जो विरोधियों के दिलों में हमेशा बना रहता है। पिछले साठ वर्षों में कई ‘सेना’ आईं और खत्म हो गईं, लेकिन बालासाहेब ठाकरे ने जिस शिवसेना की नींव रखी थी, उसका पाया और कलश आज भी जस का तस मजबूत है। इसके बावजूद, कारोबारी मिजाज वाली फर्जी सेनाओं की बाढ़ आज भी आई हुई है। शिवसेना की स्थापना कभी कोई सियासी सौदा नहीं थी और न ही शिवसेनाप्रमुख ने कभी ऐसा कोई सौदा होने दिया। यही वजह है कि वक्त-वक्त पर ऐसे सौदेबाज ठेकेदारों को बाहर का रास्ता दिखाकर शिवसेना के प्रवाह को पाक-साफ किया गया। यह उफनती हुई नदी आज भी मराठी मानुष और हिंदुत्व की विचारधारा को समेटे महाराष्ट्र की वादियों में बह रही है। जब शिवसेना का उदय हुआ, तब जाकर महाराष्ट्र की कुचली हुई कलाई में ताकत आई। संयुक्त महाराष्ट्र की स्थापना अभी नई-नई ही हुई थी। महाराष्ट्र के इस आंदोलन में कोई खास योगदान न देने के बावजूद कांग्रेस ने सत्ता पा ली थी। हां, केंद्रीय मंत्री चिंतामणराव देशमुख ने संसद के भीतर जो वित्त मंत्री पद का इस्तीफा फेंका था, उसने संयुक्त महाराष्ट्र की लड़ाई में बिजली जैसी सनसनी जरूर पैदा कर दी थी। इसके बाद यशवंतराव चव्हाण संयुक्त महाराष्ट्र का ‘मंगल कलश’ लेकर आए और भरोसा दिलाया कि ‘यह राज्य मराठी मानुष का ही है।’ लेकिन महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में मराठी मानुष को मान-सम्मान न मिले, इसका पूरा बंदोबस्त यहां के व्यापारी तबके ने कर रखा था। बाहर के लोग मुंबई आते, अपनी इमारतें खड़ी करते, खूब पैसा कमाते, नौकरियां हड़प लेते और मराठी मानुष को उसी की मुंबई में पराया बना देते। यह देखकर आखिरकार यशवंतराव चव्हाण को भी यह मलाल जाहिर करना पड़ा, ‘महाराष्ट्र में मुंबई तो है, पर मुंबई में महाराष्ट्र कहीं दिखाई नहीं देता।’ इस खौफनाक हकीकत को दूरदर्शी बालासाहेब ठाकरे ने पहले ही भांप लिया था। उन्होंने
शिवसेनारूपी तूफान
को मुंबई की सड़कों पर उतार दिया और मराठी-विरोधियों को ‘छठी का दूध’ याद दिला दिया। बालासाहेब खुद एक तूफान थे। उन्होंने अपनी कलम, अपनी आवाज और अपनी कूची की मार से विचारों का वह बवंडर खड़ा किया, जिसके निशान आज भी जगह-जगह मुस्तैद हैं। शिवसेना की वजह से भड़के जनसैलाब का वह रौद्र रूप पूरे हिंदुस्तान ने कई बार देखा है। बालासाहेब उस उग्र जनसैलाब के महानायक थे। सिर्फ अपने लफ्जों से दहशत पैदा कर देने की उनकी ताकत वाकई बेमिसाल थी।
‘खींचो न कमानों को न तलवार निकालो,
जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।
इसी नारे को माथे पर सजाकर ‘मार्मिक’ (साप्ताहिक पत्रिका) का जन्म हुआ और वह भी ठीक उसी वक्त जब मुंबई समेत संयुक्त महाराष्ट्र का सपना सच हुआ था। मुंबई के मराठी मानुष की वह तड़प, वह गुस्सा और वह बेचैनी ‘मार्मिक’ के जरिए बाहर आई। ‘मार्मिक’ के तीखे कार्टूनों के जरिए ‘ठाकरे’ मराठी मानुष के भीतर की आग को भड़काने लगे। देखते ही देखते ‘मार्मिक’ मराठी मानुष की रूह बन गया और आखिरकार क्रांति की वह चिंगारी सुलग ही गई। शिवसेना एक जलती हुई मशाल की तरह धधकती रही। बावजूद इसके ‘शिवसेना ने ६० सालों में क्या किया?’ ऐसा सवाल उठानेवाले ‘महानुभाव’ आज भी मिल जाते हैं। बदकिस्मती से वे खुद भी मराठी ही होते हैं। यह पूछना कि ‘शिवसेना ने क्या किया’, बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई अपनी मां से पूछे कि ‘क्या सच में तुम मेरी मां हो?’ शिवसेना ने मराठी मानुष को मराठी होने के नाते स्वाभिमान, आत्मसम्मान के साथ जीना सिखाया। ‘यह मुंबई मेरी है,’ यह हौसला मराठी दिलों और कलाइयों में पैदा किया। नगरसेवक बनाए। हर इलाके में ‘शाखा’ का जाल बिछाकर एक तरह से लोगों की अपनी कुटुंब न्यायालय खड़ी कर दी। पानी के नल के झगड़ों से लेकर स्कूल-कॉलेज के एडमिशन, मरीजों का इलाज और राशन कार्ड जैसे रोजमर्रा के काम शिवसैनिक वहीं बैठकर सुलझाने लगे। कहीं भी अन्याय होते देखा कि तुरंत वहां दौड़ पड़े। शिवसेना ने
समाजसेवा का पूरा ढर्रा ही
बदल दिया। चाहे कोई हादसा हो या बम धमाके, मदद के लिए सबसे पहले शिवसैनिक ही दौड़ता नजर आता। रक्तदान शिविर, पढ़ाई-लिखाई के इंतजाम, मेडिकल वैंâप, मुफ्त किताबें और कॉपियां बांटने जैसे कामों के जरिए शिवसेना हर घर का हिस्सा बन गई। शिवसेना मजदूरों और गरीबों का सहारा बनकर निस्वार्थ भाव से काम करती रही। शिवसेनाप्रमुख के जन्मदिन पर तो इन सामाजिक कामों की बहार आ जाती थी।इसी शिवसेना ने नगर पालिकाएं जीतीं, विधानसभा और लोकसभा चुनाव जीते। सत्ता को जरिया बनाकर लोकसेवा का एक विशाल पहाड़ खड़ा कर दिया। एक आम से आम इंसान को विधायक, सांसद और मंत्री बना देने का करिश्मा सिर्फ शिवसेना ही कर सकी। शिवसेना महाराष्ट्र के गौरव का शिखर बन गई। लेकिन पिछले कुछ समय से उस शिखर को काटने और महाराष्ट्र के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने की जिद जारी है। अभी तक शिवसेना को तोड़ने की कई कोशिशें हुईं। शिवसेना की स्थापना की शुरुआत से ही महत्वाकांक्षा के दर्द से तड़पने वालों ने शिवसेना की पीठ में खंजर घोंपे और शिवसेना इन तमाम जख्मों को सहते हुए आज यहां तक पहुंची है। ये सारे वार पीठ पर ही किए गए, क्योंकि सामने से आकर वार करने की हिम्मत किसी माई के लाल में नहीं थी। शिवसेनाप्रमुख ने एक बार बड़े दर्द से कहा था, ‘मेरी पीठ पर इतने घाव हो चुके हैं कि अब नए जख्म के लिए पीठ पर जगह ही नहीं बची है।’ इसी कसक को सीने में दबाए शिवसेना आज साठ साल की हुई है। इस सफर में जहां एक तरफ वफादारों की फौज खड़ी हुई, वहीं कुछ खुदगर्ज, लाचार और बेईमान भी पैदा हुए। उन्होंने अपना उल्लू सीधा किया और भाग खड़े हुए। यह सियासत में खत्म होती सच्चाई और नैतिकता का जीता-जागता सबूत है। शिवसेना ने जिस तरह सह्याद्रि की वादियों में ‘मराठी’ बयार चलाई, उसी तरह हिंदुत्व का शंखनाद करके पूरे हिंदू समाज को जगाया। लड़ाई चाहे मलंगगढ़ की हो या अयोध्या की, हिंदुत्व के इस महायज्ञ में शिवसेना ने जितनी आहुतियां दी हैं, क्या उतना काम आज के इन ‘फर्जी’ हिंदुत्ववादियों ने कभी किया है? जैसे छत्रपति शिवाजी महाराज के बारे में कहा जाता है कि अगर शिवराय न होते तो हिंदुओं की सुन्नत हो जाती, ठीक उसी कार्य को शिवसेनाप्रमुख ने आगे बढ़ाया, लेकिन देश की अखंडता को कायम रखते हुए। ‘पहले राष्ट्र, फिर सब कुछ’ यह मंत्र शिवसेना ने हमेशा याद रखा। इस मंत्र की गूंज आज भी जारी है और हमेशा जारी रहेगी। शिवसेना अमर है… अमर रहेगी!
