भरतकुमार सोलंकी
भारत में बैंकिंग और ऋण व्यवस्था में आज एक व्यक्ति के विभिन्न बैंकों, वित्तीय संस्थानों और क्रेडिट कार्ड कंपनियों के रिकॉर्ड को जोड़कर एकीकृत क्रेडिट प्रोफाइल तैयार की जाती है, जिसे आमतौर पर सिबिल स्कोर के रूप में जाना जाता है। इसी मॉडल को यदि जीवन बीमा क्षेत्र में लागू किया जाए, तो क्या प्रत्येक नागरिक के लिए एक राष्ट्रीय बीमा प्रोफाइल तैयार की जा सकती है? वित्तीय और बीमा क्षेत्र के अनेक विशेषज्ञ मानते हैं कि डिजिटल इंडिया के अगले चरण में यह विचार गंभीर चर्चा का विषय बन सकता है।
क्या हो सकता है “इंश्योरेंस सिबिल” मॉडल?
कल्पना कीजिए कि किसी व्यक्ति ने विभिन्न जीवन बीमा कंपनियों से अलग-अलग समय पर बीमा पॉलिसियां खरीदी हैं। वर्तमान व्यवस्था में इन सभी कंपनियों के पास उस व्यक्ति का डेटा अलग-अलग रहता है। यदि नियामक स्तर पर एकीकृत प्लेटफॉर्म विकसित किया जाए, तो आधार, पैन, आयकर विवरण, बैंकिंग व्यवहार और विभिन्न बीमा कंपनियों के रिकॉर्ड को जोड़कर व्यक्ति की कुल बीमा सुरक्षा का समग्र आकलन संभव हो सकता है।
बीमा विशेषज्ञों के अनुसार, इससे यह पता लगाना आसान होगा कि किसी व्यक्ति के पास उसकी आय और वित्तीय जिम्मेदारियों के अनुपात में पर्याप्त जीवन बीमा है या नहीं। साथ ही, ओवर-इंश्योरेंस और अंडर-इंश्योरेंस, दोनों स्थितियों की पहचान भी बेहतर ढंग से हो सकेगी।
IRDAI की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण?
बीमा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि ऐसा कोई भी मॉडल केवल नियामक संस्था ‘इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया’ (IRDAI) की पहल से ही संभव हो सकता है।
इसके लिए आवश्यक होगा कि:
* सभी जीवन बीमा कंपनियों के डेटा का एकीकृत प्रारूप बनाया जाए।
* ग्राहक की सहमति-आधारित डेटा साझाकरण व्यवस्था विकसित हो।
* आधार, पैन और आयकर रिकॉर्ड के साथ सत्यापन की वैधानिक व्यवस्था बने।
* डेटा सुरक्षा और गोपनीयता के लिए मजबूत साइबर सुरक्षा ढांचा तैयार किया जाए।
* बीमा खरीद, नवीनीकरण और जोखिम मूल्यांकन को डिजिटल रूप से एकीकृत किया जाए।
ह्यूमन लाइफ वैल्यू आधारित ऑटोमेटेड रिस्क कवर
वर्तमान में अधिकांश जीवन बीमा योजनाओं में बीमा राशि तय करते समय आय, आयु, स्वास्थ्य और वित्तीय दायित्वों को ध्यान में रखा जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डेटा एनालिटिक्स की सहायता से “ह्यूमन लाइफ वैल्यू” का अधिक सटीक आकलन संभव हो सकता है।
उदाहरण के तौर पर, यदि किसी व्यक्ति की आय बढ़ती है, गृह ऋण बढ़ता है या पारिवारिक जिम्मेदारियां बढ़ती हैं, तो सिस्टम उसे अतिरिक्त बीमा सुरक्षा की आवश्यकता के बारे में स्वतः सुझाव दे सकता है। इसी प्रकार, आय में कमी या ऋण समाप्त होने पर बीमा संरचना की समीक्षा भी संभव हो सकती है।
पारंपरिक योजनाओं में पारदर्शिता की मांग
वर्षों से यह बहस चलती रही है कि पारंपरिक जीवन बीमा योजनाओं में ग्राहक को निवेश और बीमा सुरक्षा के वास्तविक अनुपात की स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती। कई वित्तीय विश्लेषक मानते हैं कि भविष्य में ऐसी तकनीक विकसित की जा सकती है, जिसमें प्रत्येक पॉलिसीधारक अपने मोबाइल पर यह देख सके कि:
* उसकी कुल फंड वैल्यू कितनी है।
* वास्तविक जीवन बीमा सुरक्षा कितनी है।
* प्रीमियम का कितना भाग निवेश में जा रहा है।
* कितना भाग जोखिम सुरक्षा पर खर्च हो रहा है।
* विभिन्न योजनाओं का वास्तविक प्रतिफल क्या है।
ऐसी व्यवस्था निवेशकों के लिए पारदर्शिता बढ़ा सकती है और वित्तीय साक्षरता को मजबूत कर सकती है।
“वन नेशन, वन इंश्योरेंस ऐप” की परिकल्पना
तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में एक राष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किया जा सकता है, जहां नागरिक:
* अपनी सभी जीवन बीमा पॉलिसियां एक स्थान पर देख सकें।
* नामांकन (Nominee) की स्थिति जांच सकें।
* कुल बीमा सुरक्षा का आकलन कर सकें।
* प्रीमियम देय तिथियों की जानकारी प्राप्त कर सकें।
* दावा (Claim) प्रक्रिया की स्थिति ट्रैक कर सकें।
* निवेश और जोखिम सुरक्षा को अलग-अलग समझ सकें।
इस प्रकार का प्लेटफॉर्म बीमा क्षेत्र के लिए वैसा ही परिवर्तनकारी साबित हो सकता है, जैसा बैंकिंग क्षेत्र में यूपीआई ने भुगतान प्रणाली के लिए किया।
चुनौतियां भी कम नहीं
हालांकि, विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि इस प्रकार की व्यवस्था लागू करने में कई चुनौतियां सामने आएंगी:
* नागरिकों की गोपनीयता की सुरक्षा।
* डेटा लीक और साइबर जोखिम।
* विभिन्न कंपनियों के डेटा का मानकीकरण।
* कानूनी और नियामकीय संशोधन।
* ग्राहक की सहमति-आधारित डेटा उपयोग व्यवस्था।
* एल्गोरिदम आधारित निर्णयों में पारदर्शिता।
भविष्य का भारत: सुरक्षा और निवेश का संतुलन
वित्तीय क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि भारत की बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था में बीमा क्षेत्र भी अगले दशक में बड़े तकनीकी बदलावों से गुजर सकता है। यदि जीवन बीमा, आय, निवेश और जोखिम मूल्यांकन को सुरक्षित और पारदर्शी ढंग से एकीकृत किया जाता है, तो इससे नागरिकों को अधिक उपयुक्त बीमा सुरक्षा मिल सकती है और देश में दीर्घकालिक निवेश संस्कृति भी मजबूत हो सकती है।
प्रश्न यह है कि जिस प्रकार बैंकिंग क्षेत्र में एकीकृत क्रेडिट इतिहास ने ऋण व्यवस्था को नया स्वरूप दिया, क्या उसी प्रकार भविष्य में “राष्ट्रीय बीमा प्रोफाइल” भारत के प्रत्येक नागरिक की वित्तीय सुरक्षा का आधार बन सकती है? आने वाले वर्षों में यह विचार बीमा सुधारों की बहस का महत्वपूर्ण विषय बन सकता है।
