मुख्यपृष्ठस्तंभपॉलिटिका : लोकतंत्र, अविश्वास और राजनीतिक असुरक्षा का विमर्श

पॉलिटिका : लोकतंत्र, अविश्वास और राजनीतिक असुरक्षा का विमर्श

के.पी. मलिक

भारतीय राजनीति में समय-समय पर ऐसे दौर आते रहे हैं, जब विपक्षी दलों, लोकतांत्रिक संस्थाओं और सत्ता के बीच भरोसे का संकट गहराता हुआ दिखाई देता है। वर्तमान राजनीतिक माहौल में भी कुछ ऐसा ही परिदृश्य उभरता नजर आ रहा है, जहां विपक्ष के एक बड़े वर्ग के भीतर यह धारणा मजबूत हुई है कि संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता, लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा की समानता और राजनीतिक सुरक्षा जैसे प्रश्न पहले से अधिक गंभीर हो चुके हैं।
इस बहस का केंद्र केवल चुनावी राजनीति नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की उन बुनियादी संस्थाओं पर जनता के विश्वास का प्रश्न है, जिस पर पूरे संवैधानिक ढांचे की स्थिरता निर्भर करती है। जब किसी समाज में यह धारणा बनने लगे कि जांच एजेंसियों का उपयोग राजनीतिक दबाव के औजार के रूप में किया जा रहा है, तब वास्तविकता चाहे जो भी हो, लोकतांत्रिक विश्वास कमजोर पड़ने लगता है। लोकतंत्र केवल निष्पक्ष होने से नहीं चलता, बल्कि उसे निष्पक्ष दिखाई भी देना चाहिए।
इसी संदर्भ में विपक्षी दलों के बीच यह चिंता लगातार व्यक्त की जाती रही है कि केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई अक्सर विपक्षी नेताओं और दलों पर केंद्रित दिखाई देती है। दूसरी ओर सरकार और उसके समर्थकों का तर्क है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। लेकिन लोकतांत्रिक दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या देश की संस्थाओं पर जनता का भरोसा पहले जैसा बना हुआ है? यदि नहीं, तो यह किसी एक दल या नेता का नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे का संकट है।
राजनीतिक विश्लेषकों की एक दूसरी चिंता विपक्ष की संगठनात्मक कमजोरी को लेकर भी है। विशेष रूप से राहुल गांधी और कांग्रेस के संदर्भ में यह बहस अक्सर सामने आती है कि क्या कांग्रेस आज भी एक वैचारिक संगठन है या फिर नेतृत्व-केंद्रित संरचना में परिवर्तित हो चुकी है। कांग्रेस के समर्थक इसे ऐतिहासिक विरासत और राष्ट्रीय उपस्थिति का प्रतीक मानते हैं, जबकि आलोचक कहते हैं कि पार्टी का संगठनात्मक पुनर्निर्माण अभी भी अधूरा है। यह बहस नई नहीं है, लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में इसका महत्व अवश्य बढ़ गया है।
हालांकि, राजनीतिक मतभेदों के बीच एक सीमा ऐसी भी होती है, जहां लोकतांत्रिक आलोचना और राजनीतिक आशंका के बीच अंतर करना आवश्यक हो जाता है। किसी भी नेता की सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन बिना प्रमाण के किसी संभावित हिंसक साजिश या हमले की निश्चित भविष्यवाणी करना जिम्मेदार राजनीतिक विमर्श का हिस्सा नहीं माना जा सकता। भारत का इतिहास राजनीतिक हिंसा की दुखद घटनाओं से भरा रहा है, इसलिए सुरक्षा संबंधी चिंताओं को गंभीरता से लिया जाना चाहिए, लेकिन उन्हें तथ्यों और संस्थागत प्रक्रियाओं के आधार पर ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
दरअसल, वर्तमान दौर में सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि कौन-सा दल जीतेगा और कौन-सा हारेगा। असली प्रश्न यह है कि क्या लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सभी पक्षों का विश्वास बना रहेगा? क्या विपक्ष को यह भरोसा होगा कि वह स्वतंत्र रूप से राजनीति कर सकता है? क्या सत्ता पक्ष को यह विश्वास होगा कि उसकी वैधता को केवल राजनीतिक विरोध के आधार पर खारिज नहीं किया जाएगा? और क्या जनता यह महसूस करेगी कि न्यायपालिका, चुनावी व्यवस्था तथा संवैधानिक संस्थाएं राजनीतिक संघर्ष से ऊपर खड़ी हैं?
इतिहास बताता है कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि संस्थाओं पर सामूहिक विश्वास होता है। जब यह विश्वास कमजोर पड़ता है, तब राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ता है और समाज दो विरोधी खेमों में बंटने लगता है। ऐसे समय में आवश्यकता किसी समानांतर ‘जनता बल’ या राजनीतिक सुरक्षा समूहों के निर्माण की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को अधिक पारदर्शी, अधिक जवाबदेह और अधिक विश्वसनीय बनाने की होती है।
बहरहाल, भारत आज एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मोड़ पर खड़ा है। यदि विपक्ष को लगता है कि लोकतंत्र खतरे में है, तो उसे जनसमर्थन, संगठन और वैचारिक संघर्ष के माध्यम से अपनी बात रखनी होगी। यदि सरकार स्वयं को लोकतांत्रिक मूल्यों की संरक्षक मानती है, तो उसे संस्थागत निष्पक्षता पर उठने वाले प्रश्नों का उत्तर अधिक पारदर्शिता के साथ देना होगा। अंतत: लोकतंत्र किसी एक नेता, एक दल या एक विचारधारा का नाम नहीं है; यह उन संस्थाओं और नागरिक विश्वास का नाम है जो मतभेदों के बावजूद राष्ट्र को एक साथ बांधे रखते हैं। आज का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न यही है कि क्या भारत का लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने तक सीमित रहेगा, या फिर वह संस्थागत विश्वास और संवैधानिक मूल्यों की नई पुनर्स्थापना की ओर बढ़ेगा? यही आने वाले वर्षों की सबसे निर्णायक राजनीतिक लड़ाई होगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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