संतोषी रावत
गाजा का वह सायरन। गाजा के अल-शिफा अस्पताल। अचानक, हवा को चीरता हुआ एक सायरन बज उठा। लाउडस्पीकर पर चीख गूंजी, ‘सभी बच्चों को तुरंत सुरक्षित कमरों में ले जाओ!’ देखते ही देखते पूरे अस्पताल में अफरा-तफरी मच गई। डॉक्टर्स, नर्सें और बदहवास माता-पिता अपने ड्रिप स्टैंड और घायल मासूमों को गोद में उठाकर बेसमेंट की तरफ भागने लगे। एक भयानक गड़गड़ाहट के साथ आसमान से मौत बरसने लगी। इस तरह की सैन्य कार्रवाई के अंतहीन सिलसिले में, एक-एक कर कुल २,६६८ फिलिस्तीनी मासूमों की सांसें हमेशा के लिए थम गईं।
बंदूक की नोक पर
नाइजीरिया के एक सुदूर गांव में रात का सन्नाटा गहरा था। अचानक भारी बूटों की थाप और चीख-पुकार से बच्चों की आंख खुली। हथियारबंद हमलावरों ने घरों के दरवाजे तोड़ डाले। माताओं की चीखों और पिताओं की मिन्नतों को दरकिनार कर, चीखते-चिल्लाते बच्चों को ट्रकों में भेड़-बकरियों की तरह ठूंसा जाने लगा। नाइजीरिया, कांगो और म्यांमार जैसे देशों में बंदूक की नोक पर एक-एक कर कुल ५,१२९ बच्चों का अपहरण किया गया, जिनका आज तक कोई सुराग नहीं मिला है।
यौन हिंसा की आग में मासूम
सोमालिया के एक विस्थापित कैंप के पीछे, जहां रोशनी भी जाने से कतराती थी, वहां इंसानियत का सबसे क्रूर चेहरा बेनकाब हो रहा था। बंदूक की नोंक पर एक मासूम बच्ची की चीख को दबा दिया गया। युद्ध के साए में जी रहे इन इलाकों में वह अकेली नहीं थी। बलात्कार और भयानक यौन हिंसा की आग में झुलसने वाले उन १,७८३ मासूम बच्चों की रूह आज भी इंसाफ की भीख मांग रही है, जो आने वाली कई सदियों तक इंसानी सभ्यता को शर्मसार करती रहेगी।
बारूद पर बाल सैनिक
कांगो के घने जंगलों में छिपे एक मिलिट्री कैंप में, १० साल के बच्चे के कांपते कंधों पर एक भारी राइफल टांग दी गई। कमांडर ने चिल्लाकर कहा, ‘फायर…।’ उस बच्चे की आंखों से आंसू बह रहे थे, क्योंकि कुछ ही दिनों पहले उसका बचपन, उसका घर और उसकी मां उससे छीन लिए गए थे। कांगो, हैती और कोलंबिया के युद्धग्रस्त इलाकों में ६,६०७ बच्चों के हाथों से खिलौने छीनकर उन्हें जबरन मौत का सौदागर बना दिया गया। ये वो बाल सैनिक हैं, जिन्हें यह भी नहीं पता कि वे किसकी लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन सरकारी सेनाओं और विद्रोही गुटों की नफरत की आग में झुलसने के लिए उन्हें बारूद के ढेर पर धकेल दिया गया है।
ये यूएन रिपोर्ट के भयावह आंकड़ों पर आधारित चार अलग-अलग देशों के क्रूर दिल दहला देने वाले दृश्य हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, युद्धग्रस्त क्षेत्रों में पिछले साल करीब २५,००० मासूम बच्चे हत्या, अपहरण, यौन हिंसा और जबरन भर्ती जैसे जघन्य अपराधों का शिकार हुए। ३० वर्षों में पहली बार इन अत्याचारों के लिए विभिन्न देशों की सरकारी सेनाएं सबसे ज्यादा जिम्मेदार पाई गई हैं।
बकौल यूएन की वैनेसा फ्रेजियर, ‘अब सिर्फ चिंता जताने से काम नहीं चलेगा। वैश्विक समुदाय को बच्चों की सुरक्षा के लिए तुरंत ठोस कदम उठाने होंगे, वरना यह संकट मानवता पर सबसे बड़ा धब्बा बन जाएगा।’
