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बिहार में ताश के पत्तों की तरह ढह रहे पुल…खतरे में लाखों लोगों की जान

बिहार में पिछले दो वर्षों (२०२४ से २०२६ के बीच) में पुल गिरने की घटनाएं इतनी तेजी से बढ़ी हैं कि इसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इस दौरान छोटे-बड़े, निर्माणाधीन और दशकों पुराने ३० से अधिक पुल और पुलिया ताश के पत्तों की तरह ढह चुके हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि साल २०२४ के जून-जुलाई महीने में महज ३ हफ्तों के भीतर १३ से १४ पुल गिर गए थे। पिछले दो साल की कुछ सबसे प्रमुख और चर्चित घटनाएं इस प्रकार हैं।
बड़े और प्रमुख पुलों के हादसे
विक्रमशिला सेतु (भागलपुर – २०२६): गंगा नदी पर बना यह २५ साल पुराना महत्वपूर्ण पुल हाल ही में ढह गया। इस पुल में आ रही दरारों को लेकर कई बार पत्राचार हुआ था, लेकिन समय रहते कदम नहीं उठाए गए।
अगुवानी-सुल्तानगंज गंगा पुल (भागलपुर – अगस्त २०२४): यह महासेतु निर्माण के दौरान ही तीसरी बार दुर्घटनाग्रस्त हुआ, जब इसके पिलर संख्या ९ का सुपर-स्ट्रक्चर गंगा नदी में समा गया। इससे पहले २०२३ में भी इसका बड़ा हिस्सा गिरा था।
बख्तियारपुर-ताजपुर गंगा महासेतु (समस्तीपुर/पटना – सितंबर २०२४): करीब १६०० करोड़ रुपये की लागत से बन रहे इस मेगा ब्रिज के गर्डर को बदलते समय पिलर का एक हिस्सा गिर गया।
कोसी नदी पुल (सुपौल-मार्च २०२४): भारतमाला परियोजना के तहत १२०० करोड़ की लागत से बन रहे बकौर-भेजा घाट निर्माणाधीन पुल का एक बड़ा हिस्सा ढह गया था, जिसमें दबकर एक मजदूर की मौत भी हुई थी।
जून-जुलाई २०२४ का ‘पुल ढहने का सिलसिला’
साल २०२४ के मानसून की शुरुआत में महज १५ से २० दिनों के भीतर बिहार के अलग-अलग जिलों में एक के बाद एक कई पुल गिरे, जिनमें से कुछ एक ही दिन में ढहे!
अररिया (१८ जून २०२४): बकरा नदी पर करीब १२ करोड़ की लागत से बना नवनिर्मित पुल उद्घाटन से पहले ही नदी में बह गया।

सीवान और सारण (जून-जुलाई २०२४): इन दोनों जिलों में गंडक और अन्य सहायक नदियों पर बने करीब ५ से ६ छोटे और मध्यम पुल (कुछ १५ साल पुराने तो कुछ ब्रिटिश काल के) पानी के तेज बहाव और गाद सफाई की लापरवाही के कारण एक ही हफ्ते के भीतर टूट गए।
पूर्वी चंपारण, किशनगंज, और मधेपुरा (जून २०२४): इन जिलों में भी निर्माणाधीन और पुराने पुल और पुलिया लगातार गिरे।
हालिया स्थिति (जून २०२६ तक)
लगातार हो रहे हादसों और सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद सरकार ने राज्य के ६० मीटर से अधिक लंबे सभी पुलों का स्ट्रक्चरल ऑडिट (सुरक्षा जांच) करवाया। जून २०२६ में आई इस सरकारी रिपोर्ट के आंकड़े बेहद डरावने हैं:
सरकारी ऑडिट रिपोर्ट (जून २०२६):बिहार के २३ बड़े पुलों की हालत इस वक्त बेहद खस्ता (खतरनाक) पाई गई है, जबकि ५० अन्य पुलों को तुरंत मरम्मत की जरूरत है। सुरक्षा को देखते हुए फिलहाल ४ बड़े पुलों पर भारी वाहनों (ट्रकों) की एंट्री पूरी तरह बैन कर दी गई है।
इन हादसों की मुख्य वजहें
भ्रष्टाचार और घटिया सामग्री: सीमेंट की जगह बालू का अत्यधिक इस्तेमाल और कमजोर लोहे की छड़ें। ठेकेदारी का L-1′ नियम: सबसे कम बोली लगाने वाले को टेंडर देना, जिससे कंस्ट्रक्शन क्वालिटी से समझौता होता है। पुल के खंभों के पास से मनमाने तरीके से मिट्टी या गाद हटाना, जिससे उनकी नींव कमजोर हो गई।

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